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अगर लोकसभा और सारी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने हों, तो जनप्रतिनधित्व कानून में संशोधन के बगैर यह नहीं हो सकता। संवैधानिक संशोधन पारित कराने तथा एक साथ चुनाव की मंशा को विवाद-रहित बनाने के लिए राजनैतिक सर्वसम्मति अपरिहार्य है।
Author October 10, 2017 00:50 am
चुनाव आयोग के दफ्तर की तस्वीर।

लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का प्रस्ताव अब एक बड़ा विचारणीय मुद््दा बनता जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई मौकों पर इसकी वकालत कर चुके हैं। फिर, उनकी पार्टी यानी भाजपा भी उनके सुर में सुर मिला चुकी है। केंद्र सरकार की दिलचस्पी के कारण निर्वाचन आयोग को भी इस पर अपना रुख बताना पड़ा है। केंद्र ने जानना चाहा था कि लोकसभा और सारी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के सुझाव पर उसकी क्या राय है, और एक साथ चुनाव कराने में क्या वह सक्षम है। आयोग ने अपनी रजामंदी जता दी है, साथ ही बताया है कि वैसी सूरत में कितने अतिरिक्त संसाधनों की जरूरत पड़ेगी। पर आयोग ने यह भी कहा है कि एक साथ चुनाव कराने के लिए सभी दलों की सहमति जरूरी है। आयोग से 2015 में भी इस बारे में राय मांगी गई थी, और तब भी उसने यही कहा था। दरअसल, यह सिर्फ राजनैतिक या नैतिक तकाजा भर नहीं है। अगर लोकसभा और सारी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने हों, तो जनप्रतिनधित्व कानून में संशोधन के बगैर यह नहीं हो सकता। संवैधानिक संशोधन पारित कराने तथा एक साथ चुनाव की मंशा को विवाद-रहित बनाने के लिए राजनैतिक सर्वसम्मति अपरिहार्य है। इसे संभव बनाने के लिए इस पर व्यापक चर्चा जरूरी है कि एक साथ चुनाव के क्या फायदे हो सकते हैं।

कोई साल ऐसा नहीं बीतता जब किसी विधानसभा या कुछ विधानसभाओं के चुनाव न होते हों। कुछ महीने पहले पांच राज्यों के चुनाव हुए थे। अगले साल सितंबर तक छह राज्यों के चुनाव होने हैं। फिर, अगले लोकसभा चुनाव की सरगर्मी होगी। थोड़े-थोड़े अंतराल पर कोई-न-कोई चुनाव होने से कई तरह की मुश्किलें रहती हैं। चुनाव की घोषणा होते ही आचार संहिता लागू हो जाती है, जिससे सरकार या सरकारों के हाथ बंध जाते हैं। इससे विकास-कार्यों पर बुरा असर पड़ता है। चुनाव संपन्न कराने पर भी खर्च ज्यादा होता है। यह सिर्फ राजकोषीय खर्च तक सीमित नहीं है। पार्टियों को भी बार-बार प्रचार अभियान के लिए धन जुटाना पड़ता है। आयोग एक चुनाव से निबट नहीं पाता कि उसे दूसरे चुनाव की तैयारी में जुट जाना पड़ता है। प्रशासन की भी काफी ऊर्जा और समय जाया होता है। शैक्षणिक कार्य पर बुरा असर पड़ता है, क्योंकि चुनाव में सबसे ज्यादा शिक्षकों की ही ड्यूटी लगती है। अगर लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ हों, तो इन सारी समस्याओं या दिक्कतों से निजात मिल सकती है।

सवाल यह है कि यह हो कैसे, यानी इसके लिए कानून में आवश्यक संशोधन तथा अपेक्षित राजनैतिक आम सहमति की शर्त कैसे पूरी हो। अभी तक विपक्षी दलों में सिर्फ कांग्रेस ने खुलकर कहा है कि वह जल्दी या एक साथ चुनाव कराए जाने के लिए तैयार है। पर वाम दलों का रुख इसके विपरीत है, उनकी दलील है कि केंद्र सरकार लोकसभा चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव कराने के लिए राज्यों को विवश नहीं कर सकती। विपक्ष की कई पार्टियों की निगाह में एक साथ चुनाव कराने का विचार अव्यावहारिक है, तो कई इसे संघीय ढांचे को चोट पहुंचाने वाला तथा खतरनाक विचार भी मानती हैं। पर उम्मीदवारी का नामांकन दाखिल करते समय संपत्ति व शिक्षा, और अगर कोई आपराधिक मामले लंबित हों, तो उनकी जानकारी देने का नियम भी आसानी से नहीं बन पाया था; शुरू में सारी पार्टियां इसके खिलाफ थीं। इसलिए राजनीतिक आम सहमति बनाने की कोशिश होनी ही चाहिए। केंद्र सरकार की अपनी राय पक्ष में होना काफी नहीं है, उसे इस मामले में विपक्षी दलों से विचार-विमर्श की गंभीर पहल भी करनी होगी।

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