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घपले की कालिख

विशेष अदालत ने कोल आबंटन के एक मामले में कोयला मंत्रालय के पूर्व सचिव एचसी गुप्ता, मंत्रालय के तत्कालीन संयुक्त सचिव के एस करोपहा, तत्कालीन निदेशक केसी समरइया को दोषी ठहराया है।

Author Published on: May 22, 2017 5:58 AM
कोयला घोटाला मनमोहन सिंह की अगुआई वाली यूपीए सरकार के दौरान हुआ था।

भ्रष्टाचार के बहुत कम मामले तार्किक परिणति तक पहुंच पाते हैं। जब रसूख वाले लोग आरोपी हों, तब तो इसकी संभावना और भी क्षीण रहती है। इस लिहाज से कोयला घोटाले के एक मामले में बीते शुक्रवार को आया फैसला एक विरल घटना है। सीबीआइ की एक विशेष अदालत ने कोल आबंटन के एक मामले में कोयला मंत्रालय के पूर्व सचिव एचसी गुप्ता, मंत्रालय के तत्कालीन संयुक्त सचिव के एस करोपहा, तत्कालीन निदेशक केसी समरइया को दोषी ठहराया है। भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम और भारतीय दंड संहिता के तहत इन्हें सजा बाद में सुनाई जाएगी। इन पूर्व आला अफसरों ने गलत दस्तावेजों के आधार पर मध्यप्रदेश के थिसगोरा बी रुद्रापुरी कोल ब्लाक को मध्यप्रदेश की कंपनी केएसएसपीएल यानी कमल स्पांज स्टील एंड पॉवर लिमिटेड को आबंटित कर दिया। अदालत ने कंपनी और उसके निदेशक को भी धोखाधड़ी तथा आपराधिक साजिश का दोषी करार दिया है। यूपीए सरकार के दौरान के जो घोटाले काफी चर्चा का विषय बने उनमें कोयला घोटाला भी था। इससे जुड़े पच्चीस से अधिक मामलों में से केवल तीन में फैसला आ पाया है। इससे पहले निजी कंपनी और उससे जुड़े अधिकारियों को ही सजा सुनाई गई थी। यह पहला मामला है जिसमें मंत्रालय के तब के आला अफसरों पर गाज गिरी है।

जाहिर है, भ्रष्टाचार के दूसरे ढेर सारे मामलों की तरह कोयला घोटाला भी भ्रष्ट नौकरशाही और बेईमान कारोबारियों के गठजोड़ की तरफ इशारा करता है। यह पद के दुरुपयोग का मामला भी है, जिसके बिना कोई घोटाला संभव नहीं हो सकता। यूपीए सरकार के दौरान कोयला घोटाले का खुलासा 2012 में सीएजी की एक ड्राफ्ट रिपोर्ट से हुआ था। रिपोर्ट के मुताबिक 2004 से 2009 के बीच गलत तरीके से कोल आबंटन किए गए। नियम-कायदों की किस कदर अनदेखी की गई, इसकी बानगी यह मामला भी है जिसमें कई पूर्व नौकरशाहों को दोषी पाया गया है। कंपनी का आवेदन अधूरा था, दिशा-निर्देशों के अनुरूप नहीं था, कंपनी ने अपने नेटवर्थ और मौजूदा क्षमता को गलत बताया था। यही नहीं, राज्य सरकार ने केएसएसपीएल को कोल ब्लाक आबंटित न करने की सलाह दी थी। इस सब के बावजूद उसका आवेदन मंजूर कर लिया गया। उस दौरान कोयला मंत्रालय का प्रभार तत्कालीन प्रधानमंत्री के पास था। इसलिए अदालत ने एचसी गुप्ता को प्रधानमंत्री को अंधेरे में रखने का दोषी भी पाया है। लेकिन क्या मनमोहन सिंह इस सवाल से बच सकते हैं कि आबंटन के लिए उन्होंने नीलामी की प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई थी?

सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक कोयला घोटाले से देश को 1.86 लाख करोड़ का नुकसान हुआ। जाहिर है, यह प्राकृतिक संसाधनों की भारी लूट का मामला भी है। 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाला भी इसी तरह का था। कोयला घोटाले में कई राजनीतिकों के भी नाम सामने आए थे। क्या पता, जो अधिकतर मामले अभी लंबित हैं उनमें से किसी फैसले में किसी राजनीतिक का भी नाम आ जाए। यह विडंबना ही है कि केएसएसपीएल को कोल ब्लाक आबंटित करने के मामले में सीबीआइ ने आरोपपत्र दाखिल करने के बजाय क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी थी। सीबीआइ ने तब कहा था कि इस मामले में पर्याप्त सबूत नहीं हैं जिससे आरोपियों को सजा दिलाई जा सके। लेकिन अदालत ने क्लोजर रिपोर्ट मंजूर नहीं की। बहरहाल, कोयला घोटाला एक सबक भी है, कि प्राकृतिक संसाधनों के आबंटन की प्रक्रिया पारदर्शिता व जवाबदेही पर आधारित हो, न कि विवेकाधिकार पर।

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