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चित्रकूट के संकेत

जिस तरह यह सीट दोनों पार्टियों के लिए नाक का सवाल बन चुकी थी, उसे देखते हुए भाजपा को खासी निराशा हुई है।

Author November 13, 2017 4:19 AM
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान। (File Photo)

मध्यप्रदेश की चित्रकूट विधानसभा सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी की विजय से निस्संदेह भाजपा को झटका लगा है। इसके पहले पंजाब के गुरदासपुर संसदीय सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी ने भाजपा के गढ़ में सेंध लगाई थी। इस तरह यह भाजपा की लगातार दूसरी पराजय है। हालांकि चित्रकूट की विधानसभा सीट पहले भी कांग्रेस के पास थी। इसलिए इसे भाजपा की कोई बड़ी हार नहीं मानना चाहिए। पर जिस तरह यह सीट दोनों पार्टियों के लिए नाक का सवाल बन चुकी थी, उसे देखते हुए भाजपा को खासी निराशा हुई है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह तीन दिन तक चित्रकूट में डेरा जमाए हुए थे, वहीं उत्तर प्रदेश की सीमा से सटी इस विधानसभा में प्रचार के लिए उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने भी जम कर चुनाव प्रचार किया था। शिवराज सिंह चौहान ने एक रात एक आदिवासी के घर में विश्राम करके अपनी सरकार की छवि गरीबों की रहनुमा वाली बनाने का प्रयास भी किया था। पर भाजपा का कोई भी दांव काम नहीं आया। हालांकि किसी सीट पर उपचुनाव के नतीजों से किसी पार्टी के वोटबैंक के खिसकने या बढ़ने का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता, पर चित्रकूट उपचुनाव के नतीजों के बाद स्थानीय लोगों की प्रतिक्रियाओं के मद्देनजर जरूर भाजपा को आत्ममंथन करना चाहिए।

चुनाव नतीजों के बाद स्थानीय लोगों ने खुल कर कहा कि वे शिवराज सिंह चौहान सरकार से संतुष्ट नहीं हैं। वे बदलाव चाहते हैं। उन्होंने भाजपा को भी महज वादे करने और नारे देने वाली पार्टी बताया। पिछले कुछ महीनों में मध्यप्रदेश में कई जगह सत्ता के खिलाफ लोगों में आक्रोश फूटता दिखा। फसल बीमा, फसलों की उचित कीमत न मिल पाने और फिर औद्योगिक इकाइयों के लिए मनमाने तरीके से कृषि योग्य भूमि के आबंटन से लोगों में नाराजगी दिखाई दी। उसमें आंदोलन कर रहे लोगों पर सरकार ने गोलियां चलवाई थी, जिसमें कई किसान मारे गए थे। व्यापमं घोटाले और उसमें रहस्यमय ढंग से मारे गए लोगों के मामले को दबा दिए जाने से भी बहुत से लोगों में नाराजगी है। चित्रकूट में गरीब के घर रात्रि विश्राम कर भले शिवराज सिंह ने खुद को गरीबों का मसीहा साबित करने की कोशिश की, पर हकीकत यह है कि वहां गरीबों के लिए चलाई जा रही योजनाओं का उन्हें उचित लाभ नहीं मिल पा रहा है। स्वच्छता अभियान जैसी योजनाओं के तहत शौचालय न बनवाने पर प्रशासन की ओर से उन्हें परेशान किया जाता है। इसके अलावा केंद्र की नीतियों को लेकर असंतोष भी उसमें शामिल हो गए हैं।

बेशक केंद्र सरकार अब भी यह साबित करने में जुटी हो कि नोटबंदी और जीएसटी देश के विकास और भ्रष्टाचार से मुक्ति के लिए आवश्यक कदम हैं, पर सच्चाई यह है कि इन दोनों फैसलों के चलते लाखों लोगों को बेरोजगार होना पड़ा है। लोगों के काम-धंधे मंद हो गए हैं। केंद्र में सत्ता की कमान संभालने के साढ़े तीन साल बीत चुकने के बाद भी भाजपा अपना एक भी चुनावी वादा पूरा नहीं कर पाई है। इसके अलावा गोरक्षा के नाम पर जगह-जगह लोगों पर हमले बढ़े हैं, अल्पसंख्यकों को बेवजह परेशान करने की घटनाएं सामने आ रही हैं। मध्यप्रदेश में भी धर्मांतरण और गोरक्षा के नाम पर अनेक लोगों को परेशान किया गया, पर सरकार उपद्रवी तत्त्वों के खिलाफ सख्त नजर नहीं आई। इन सबसे नाराजगी स्पष्ट है। जब तक भाजपा इन पहलुओं पर गंभीरता से नहीं सोचती, तब तक उसे मुश्किलों से पार पाना आसान नहीं होगा।

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