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संपादकीय: विवाद का खेल

जल्लीकट्टू को लेकर समय-समय पर जो राजनीति होती रही और मामले को कानूनी दांव-पेच में फंसा कर उसका फायदा उठाने का जो सिलसिला चलता रहा, उससे यह मामला किसी निर्णायक बिंदु पर पहुंचने के बजाय उलझता ही गया।
Author February 3, 2018 02:47 am
जल्लीकट्टू तमिलनाडु में पोंगल के त्योहार के हिस्से के तौर पर मट्टू पोंगल के दिन आयोजित किया जाता है। (फाइल फोटो)

जल्लीकट्टू से जुड़े सवालों पर फैसला प्रधान न्यायाधीश ने संविधान पीठ को सौंप दिया है। इस हिंसक खेल को लेकर विवाद जितना पेचीदा हो गया है उससे पार पाने का एकमात्र रास्ता यही है कि संविधान पीठ ही इस पर अपना निर्णय सुनाए। जल्लीकट्टू को लेकर समय-समय पर जो राजनीति होती रही और मामले को कानूनी दांव-पेच में फंसा कर उसका फायदा उठाने का जो सिलसिला चलता रहा, उससे यह मामला किसी निर्णायक बिंदु पर पहुंचने के बजाय उलझता ही गया। तमिलनाडु सरकार ने जल्लीकट्टू की राह आसान बनाने के लिए अध्यादेश तक जारी किया था। जल्लीकट्टू ऐसा पारंपरिक खेल है जिसके सदियों से खेले जाने की बात कही जाती है। यह ऐसा हिंसक खेल है जिसमें जख्मी होना तो मामूली बात है, कई बार जान तक चली जाती है।यह तमिल संस्कृति से इस तरह जुड़ गया है कि जल्लीकट्टू के आयोजन के बगैर राज्य के लोग पोंगल जैसे महापर्व की कल्पना भी नहीं कर पाते। जल्लीकट्टू पर पाबंदी लगाने के विरोध में पिछले साल चेन्नई सहित पूरे तमिलनाडु में जिस तरह लोग सड़कों पर आ गए थे, वह जल्लीकट्टू से उनके लगाव को दिखाता है। इतना ही नहीं, फिल्मी हस्तियां, आध्यात्मिक गुरु, राजनेता सब जनता के साथ खड़े नजर आए। तो ऐसे में जल्लीकट्टू पर पाबंदी की कोशिशें निष्फल ही साबित हुर्इं।

भारतीय पशु कल्याण बोर्ड और पशुओं के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था पेटा ने अपनी याचिकाओं में इस खेल को पशुओं के साथ क्रूरता बताते हुए इसे सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर इस पर पाबंदी लगाने की मांग की थी। अदालत ने नवंबर 2011 में कुछ शर्तों के साथ तमिलनाडु को इस खेल को जारी रखने की मंजूरी दी थी। पर बाद में वन और पर्यावरण मंत्रालय ने इस खेल में बैलों को शामिल करने पर प्रतिबंध लगा दिया, लेकिन तमिलनाडु रेग्यूलेशन ऑफ जल्लीकट्टू एक्ट के तहत यह खेल हुआ। मई 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के इस कानून को रद््द करते हुए जल्लीकट्टू पर पाबंदी लगा दी। पर्यावरण मंत्रालय ने एक बार फिर पलटा खाया और कुछ शर्तों के साथ जल्लीकट्टू को मंजूरी दे दी। इस पर पशु कल्याण बोर्ड फिर अदालत पहुंचा और मंत्रालय के निर्देश पर रोक लग गई। जब तमिलनाडु में लोग सड़कों पर उतर आए तो राज्य सरकार ने अपना अध्यादेश जारी करते हुए इस खेल को पशु क्रूरता निवारण कानून (1960) से अलग कर खेलने का रास्ता निकाल लिया।

सवाल है कि जल्लीकट्टू पर आखिर पांबदी लगे तो कैसे? यह ऐसा संवेदनशील मसला है जिस पर तमिल समुदाय के लोग कभी भी सड़कों पर उतर आते हैं। लेकिन इससे भी ज्यादा समस्याजनक पहलू यह है कि राज्य सरकार और राजनीतिक दल भी नहीं चाहते कि इस पर पाबंदी लगे। उन्हें लगता है कि इस पर पाबंदी का मतलब है वोट और सत्ता खो बैठना। लेकिन क्या समय के साथ रिवाज नहीं बदलते? क्या इस तरह के हिंसक खेलों का आयोजन होते रहना जायज है? अगर तमिलनाडु के सियासी दलों के बीच जलीकट्टू का पक्ष लेने की होड़ न मचती, तो शायद विवाद शांत पड़ चुका होता। राजनीति का काम नए ढंग से सोचने के लिए जनमानस को तैयार करना भी है। हमारी राजनीति इस कसौटी पर कहां ठहरती है!

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