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संतुलन की कोशिश

इस बजट में कृषि, डेयरी, शिक्षा, कौशल विकास, रेलवे और अन्य बुनियादी ढांचा क्षेत्रों के लिए आबंटन बढ़ाने का प्रस्ताव भी किया गया है।

साल 2016 में अपना दूसरा पूर्ण बजट पेश करते जाते अरुण जेटली एवं अन्य।

इस बार के बजट से हर किसी ने काफी उम्मीदें लगा रखी थीं। कई लोग मान रहे थे कि पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर इस बार कुछ लोकलुभावन घोषणाएं की जाएंगी, मगर वित्तमंत्री ने ऐसा कोई कदम उठाने के बजाय संतुलन बनाने की कोशिश की। नोटबंदी के बाद सरकार को काफी किरकिरी झेलनी पड़ी थी, उसका अर्थव्यवस्था पर भी प्रतिकूल असर पड़ा। वित्तमंत्री ने उसे सुधारने की गरज से मध्य आयवर्ग और कारोबारी समूह को करों में छूट देने का फैसला किया। आयकर का दायरा बढ़ा कर ढाई से तीन लाख रुपए कर दिया गया है। इसी प्रकार पांच लाख रुपए तक की आय पर पहले के दस प्रतिशत कर ढांचे को घटा कर पांच प्रतिशत कर दिया गया है। इससे न सिर्फ वेतनभोगी लोगों, बल्कि छोटे कारोबारियों को कुछ राहत मिलेगी। उम्मीद की जा रही है कि इससे वे कारोबारी स्वत: अपने आय-व्यय का लेखा-जोखा पेश करने को प्रोत्साहित होंगे, जो आमदनी छिपाने की कोशिश करते रहे हैं।

इस बजट में कृषि, डेयरी, शिक्षा, कौशल विकास, रेलवे और अन्य बुनियादी ढांचा क्षेत्रों के लिए आबंटन बढ़ाने का प्रस्ताव भी किया गया है। सबसे अधिक चिंता कालेधन पर रोक लगाने को लेकर देखी गई है। इसके लिए डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने, तीन लाख रुपए से अधिक के लेन-देन को रोकने और राजनीतिक दलों को मिलने वाले नगद चंदे की सीमा बीस हजार से घटा कर महज दो हजार रुपए करने का प्रस्ताव किया गया है। नोटबंदी के बाद से ही सरकार डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देती आ रही है, इसके लिए कुछ पुरस्कार और विक्रेताओं के लिए प्रोत्साहन योजनाएं भी शुरू की गई हैं। चूंकि सरकार वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम लागू करने की जल्दी में है, इसलिए भी डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देकर कालेधन पर अंकुश लगाने और कर भुगतान में पारदर्शिता लाना चाहती है। फिर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के इरादे से किए गए प्रस्ताव भी अभी कसौटी पर चढ़ने हैं। राजनीतिक दलों के नगद चंदे की सीमा घटा कर दो हजार रुपए कर देने को कालेधन का प्रवाह रोकने की दिशा में कठोर कदम कहा जा सकता है, पर इसमें कितनी कामयाबी मिल पाएगी या राजनीतिक दलों में कितनी पारदर्शिता आ पाएगी, कहना मुश्किल है।

पहली बार रेल बजट को भी आम बजट के साथ मिला दिया गया है। यह निस्संदेह सराहनीय काम है, पर अभी तक रेल बजट अलग से पेश किया जाता था तो रेलवे से जुड़े तमाम पहलुओं पर बारीकी से ध्यान दिया जाता था। इस बार रेल सुरक्षा बढ़ाने, मुसाफिरों को टिकट खरीदने में आने वाले परेशानियां दूर करने और पूंजीगत विकास पर ध्यान केंद्रित किया गया है। न रेल किराए में किसी प्रकार का बदलाव करने का फैसला किया गया और न कोई नई रेल चलाने की घोषणा की गई है। पिछले कुछ महीनों में हुए रेल हादसों के मद्देनजर यही अपेक्षा की जाती है कि रेलवे के बुनियादी ढांचे को मजबूत किया जाए और रेलगाड़ियों को समय पर चलाने का इंतजाम हो सके। सुरक्षा आदि को लेकर लंबे समय से घोषणाएं होती आ रही हैं, पर हकीकत यह है कि इस दिशा में कोई उल्लेखनीय काम नहीं हो पाया है। बहुत सारी परियोजनाएं लंबे समय से लटकी हुई हैं। अगर सरकार पूंजीगत विकास के साथ-साथ रेलवे के संचालन में सुधार कर पाती है तो निस्संदेह उल्लेखनीय कदम होगा।

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