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भाजपा का दांव

कोविंद को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाने से अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा को क्या फायदा होगा यह तो वक्त बताएगा, पर विपक्ष की एकता में दरार पड़ने के संकेत कुछ ही घंटों में सामने आ गए।

Author June 21, 2017 4:26 AM
NDA के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद ने सोमवार (19 जून) को दिल्ली में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से मुलाकात की। (Photo-PTI)

कल तक बिहार के राज्यपाल रहे रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद के लिए राजग का उम्मीदवार बना कर भाजपा ने एक तीर से दो निशाने साधे हैं। एक लक्ष्य है अगला लोकसभा चुनाव। और दूसरा लक्ष्य है विपक्ष को एकजुट न होने देना। कोविंद को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाने से अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा को क्या फायदा होगा यह तो वक्त बताएगा, पर विपक्ष की एकता में दरार पड़ने के संकेत कुछ ही घंटों में सामने आ गए। जगन मोहन रेड््डी की अगुआई वाली वाइएसआर कांग्रेस तो पहले ही कह चुकी थी कि वह राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा के प्रत्याशी का समर्थन करेगी। उम्मीदवार कोई भी होता, वाइएसआर कांग्रेस का समर्थन मिलना ही था। लेकिन कोविंद को बीजू जनता दल और तेलंगाना राष्ट्र समिति ने भी समर्थन देने की घोषणा की है। जबकि ये दोनों पार्टियां राजग का हिस्सा नहीं हैं। अन्नाद्रमुक की तरफ से भी ऐसे ही रुख की संभावना जताई जा रही है। अलबत्ता शिव सेना राजग में होते हुए भी फिलहाल कोविंद के नाम पर राजी नहीं दिखती। यों भी राष्ट्रपति चुनाव के लिए वोटों का गणित राजग के पक्ष में था। इसलिए कोविंद की जगह कोई और राजग का प्रत्याशी होता, तो उसके भी राष्ट्रपति चुने जाने की इतनी ही संभावना रहती। लेकिन मोदी और शाह ने कोविंद के रूप में एक दलित को राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बना कर विपक्ष को एकाएक संशय में डाल दिया है।

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कानपुर के एक ग्रामीण इलाके से ताल्लुक रखने वाले और दो साल से बिहार के गवर्नर रहे कोविंद को राष्ट्रपति पद पर बिठाने की तैयारी कर भाजपा ने उत्तर प्रदेश और बिहार, दोनों को साधने की कोशिश की है। फिर, इससे भी बड़ा उसका दांव है, दलितों के बीच पैठ बनाने का। इस दांव से विपक्ष चकरा गया है। मुख्यत: दलितों के समर्थन पर खड़ी बहुजन समाज पार्टी को सूझ नहीं रहा है कि वह किस मुंह से कोविंद का विरोध करे। इसलिए मायावती ने कहा कि कोविंद की दावेदारी पर उनका रुख नकारात्मक नहीं है। इसी तरह नीतीश कुमार ने अपनी पार्टी का फैसला अभी भले न जाहिर किया हो, मगर कोविंद के नाम पर व्यक्तिगत रूप से प्रसन्नता जताई है। सपा दुविधा में है तो तृणमूल कांग्रेस, वाम दलों और कांग्रेस को समझ नहीं आ रहा है कि विपक्ष को कैसे एकजुट करें। जवाब में इधर से भी दलित उम्मीदवार उतारने का सुझाव आया है। सब जानते हैं कि यह प्रतीकों की राजनीति है और इसमें पहल करके मोदी-शाह ने बाजी मार ली है।

बिहार के गवर्नर रह चुके कोविंद दो बार राज्यसभा के सदस्य रहे। वे सुप्रीम कोर्ट में वकालत भी कर चुके हैं। जाहिर है, उन्हें राजनीति का भी अनुभव है और कानून का ज्ञान भी। पर भाजपा व संघ से उनके जुड़ाव ने भी उनके चयन में अहम भूमिका निभाई होगी। मोदी 2019 के चुनाव के लिए दलित कार्ड खेलना चाहते होंगे तो वह भी हो गया, और संघ को भी तसल्ली हो गई होगी कि उससे दीक्षा लेकर आया व्यक्ति अगला राष्ट्रपति होगा। अगले लोकसभा चुनाव में मोदी को इसका कितना लाभ मिलेगा, इस बारे में कुछ कहना जल्दबाजी होगी, क्योंकि मोदी की तरफ से दलितों में पैठ बढ़ाने की तमाम कवायद के बावजूद रोहित वेमुला की खुदकुशी और उना तथा सहारनपुर जैसी भी घटनाएं हुई हैं जिनके चलते दलितों के मन में भाजपा के प्रति नाराजगी पैदा हुई। पर मोदी ने अगले लोकसभा चुनाव के मद््देनजर महा गठबंधन बनाने और राष्ट्रपति चुनाव में उसका प्रयोग करने की विपक्ष की रणनीति को आईना जरूर दिखा दिया है।

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