JANSATTA EDITORIAL ABOUT BJP NOTIFICATION FIR ANIMAL CRUELTY - Jansatta
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दुरुस्त आयद

नियमावली जारी होते ही केरल और मिजोरम ने तीखा विरोध जताया था और उसे लागू न करने का एलान किया था। पश्चिम बंगाल ने भी कड़े शब्दों में मुखालफत की थी।

Author October 2, 2017 6:13 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है।

अब केंद्र सरकार को खुद यह महसूस होने लगा है कि पशु बाजारों के नियमन के लिए मई के तीसरे हफ्ते में उसने जो नियमावली जारी की थी उस पर पुनर्विचार की जरूरत है। पर्यावरण मंत्रालय ने राज्यों को पत्र लिख कर नियमावली पर उनकी राय मांगी है। यह दिलचस्प है कि अब मंत्रालय ने राज्यों की राय जानने की जरूरत महसूस की है, जबकि कई राज्यों के विरोध की लगातार अनदेखी की जाती रही। गौरतलब है कि नियमावली जारी होते ही केरल और मिजोरम ने तीखा विरोध जताया था और उसे लागू न करने का एलान किया था। पश्चिम बंगाल ने भी कड़े शब्दों में मुखालफत की थी। पशु क्रूरता निवारण कानून 1960 में ही बन गया था। पर इस कानून के तहत ऐसे सख्त और अव्यावहारिक नियम बनाने का खयाल पहले की किसी भी सरकार को नहीं आया था। आखिर इन नियमों में ऐसा क्या था कि हंगामा खड़ा हो गया और कई तरफ से विरोध की आवाजें उठीं। दरअसल, इन नियमों ने मांस के लिए पशुओं की खरीद-फरोख्त को लगभग असंभव बना दिया।

इन नियमों के तहत केंद्र ने पशु बाजारों में गाय, भैंस, बैल, बछड़ा, बछिया, सांड और ऊंट जैसे मवेशियों को वध के लिए खरीदे जाने पर रोक लगा दी। नियमावली के मुताबिक इन्हें उन्हीं लोगों को बेचा जा सकेगा जो लिखित गारंटी देंगे कि वे मवेशी को दूध या कृषिकार्य के लिए खरीद रहे हैं। इसके लिए पहचान और पते का प्रमाण भी देना होगा। खुद को किसान साबित करने के लिए कृषि राजस्व संबंधी दस्तावेज दिखाने होंगे। यह भी जरूरी कर दिया गया कि खरीदार को बिक्री के सबूत की प्रति विक्रेता समेत जिले के स्थानीय राजस्व अधिकारी, पशु चिकित्सा अधिकारी और पशु बाजार समिति को देनी होगी। इतने सारे नियमों का अनुपालन कौन कर सकता है! केरल और पूर्वोत्तर के राज्यों ने विरोध जताया, तो उसकी मूल वजह भोजन संबंधी उनकी आदतें रही होंगी। पर कई वैधानिक सवाल भी उठे। मसलन, पशुओं की खरीद-फरोख्त राज्यों का विषय है। इसलिए अनेक राज्यों ने नियमावली को अपने अधिकार क्षेत्र में बेजा दखल करार दिया। इसे नागरिक अधिकारों पर हमला भी बताया। इसी बिना पर यह मामला अदालत में भी गया। मई में ही मद्रास हाइकोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय की तरफ से जारी नियमावली पर रोक लगा दी। फिर, जुलाई में सर्वोच्च अदालत ने उस स्थगन आदेश को सही ठहराते हुए उसे पूरे देश के लिए लागू कर दिया।

अब केंद्र की स्थिति आया ऊंट पहाड़ के नीचे वाली हो गई। सर्वोच्च अदालत के फैसले के अलावा कुछ और कारणों से भी केंद्र को अपनी नियमावली अपने लिए बोझ लगने लगी। एक तो कारोबार जगत ने इसे पसंद नहीं किया, क्योंकि मांस के धंधे के अलावा चमड़ा उद्योग तथा ब्रश, बटन, बैग आदि बनाने वाले उद्योग भी प्रभावित हो रहे थे। फिर इससे भी ज्यादा चिंता में डाल देने वाली नाराजगी किसानों और ग्वालों की रही है। देश के काफी बड़े हिस्से में पशुओं की खरीद-फरोख्त ठप हो जाने से गांव-गांव में छुट््टा पशुओं से अपनी फसल बचाना किसानों के लिए मुश्किल हो रहा है। पिछले दिनों सीकर में चले किसान आंदोलन की एक खास मांग यह भी थी कि बछड़ों की बिक्री पर से रोक हटे और पशु व्यापारियों को पूरी सुरक्षा दी जाए। बहरहाल, केंद्र ने राज्यों की राय मांगी है, तो देर से ही सही, यह दुरुस्त कदम है।

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