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हिंसा के परिसर

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्वविद्यालय और चंडीगढ़ के पंजाब विश्वविद्यालय में पुलिस के जरिए विद्यार्थियों को ‘अनुशासित’ करने का प्रयास किया गया।

बीएचयू में छेड़खानी के विरोध में प्रदर्शन कर रही छात्राओं पर कल पुलिस ने लाठी चार्ज किया था। (PTI)

यह समझ पाना मुश्किल है कि बातचीत के जरिए विद्यार्थियों की समस्याएं सुलझाने के बजाय विश्वविद्यालय प्रशासन केवल बल प्रयोग पर क्यों यकीन करने लगा है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्वविद्यालय और चंडीगढ़ के पंजाब विश्वविद्यालय में पुलिस के जरिए विद्यार्थियों को ‘अनुशासित’ करने का प्रयास किया गया। उसके चलते प्रशासन के तौर-तरीकों को लेकर ढेरों सवाल उठे। पर लगता है, उन घटनाओं से दूसरे विश्वविद्यालयों के कुलपतियों ने कोई सबक नहीं लिया। इसी का नतीजा है कि बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में सुरक्षा की मांग को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन कर रही छात्राओं पर शनिवार देर रात पुलिस ने लाठी भांजी, जिसमें कई छात्राएं गंभीर रूप से घायल हो गर्इं।

बीएचयू में छात्राओं के साथ छेड़खानी की घटनाएं आम हैं। बीते गुरुवार को एक छात्रा के साथ कुछ युवकों ने बदसलूकी की। उसके विरोध में छात्राओं ने कुलपति कार्यालय के बाहर धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिया। उनकी मांग थी कि कुलपति खुद आकर उनकी बात सुनें और लड़कियों के लिए सुरक्षा-उपायों का यकीन दिलाएं। मगर दो दिन बीत जाने के बाद भी प्रशासन का कोई जिम्मेदार व्यक्तिउनसे बात करने नहीं आया। उलटे शनिवार रात को छात्राओं पर पुलिस से लाठी चलवा दी गई।

विचित्र है कि बीएचयू में छात्राओं के आंदोलन में ऐसे लड़के भी घुस आए, जो लड़कियों की सुरक्षा की मांग का साथ देने के बजाय नारा लगाने लगे कि वे बीएचयू को जेएनयू नहीं बनने देंगे। यानी शाम ढलने के बाद लड़कियों का छात्रावास से बाहर निकलना उन्हें कतई बर्दाश्त नहीं है। बताया जाता है कि बीएचयू प्रशासन ने भी लड़कियों का पक्ष समझने के बजाय यह दलील पेश की कि वे रात को छात्रावास से बाहर निकलती ही क्यों हैं।

आज जब लड़कियों की बराबरी की बात की जा रही है; प्रधानमंत्री बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा देते फिरते हैं, बीएचयू जैसे शैक्षिक परिसरों में छात्राओं को बंदिशों में बांधने का प्रयास हो रहा है। जिस वक्त बीएचयू की छात्राएं अपनी सुरक्षा के लिए आवाज उठा रही थीं, प्रधानमंत्री बनारस के दौरे पर थे। सुरक्षा कारणों से उनका रास्ता बदल दिया गया, मगर यह भी तो जरूरी था कि वे छात्राओं की सुध लेते।

विश्वविद्यालय के कुलपति ने शनिवार रात को हुई घटना की जांच के आदेश दे दिए हैं। दरअसल, पुलिस ने लड़कियों पर लाठी चलाई उसके बाद छात्रों के साथ उसकी हिंसक झड़पें भी हुर्इं। परिसर में कुछ वाहनों को आग लगा दी गई। कुलपति का कहना है कि आगजनी और पुलिस के साथ हिंसक झड़पें करने वाले परिसर के बाहर के लोग थे। उनकी पहचान के लिए जांच समिति बना दी गई है। मगर कुलपति को छात्राओं से बात करने से क्या गुरेज थी? आखिर उनके परिसर की एक छात्रा के साथ बदसलूकी हुई थी। क्या यह घटना उनके लिए चिंता का विषय नहीं थी? आखिर परिसर में छात्राओं की सुरक्षा विश्वविद्यालय-प्रशासन की जिम्मेदारी है या नहीं? फिर, एक कुलपति और विद्यार्थियों में इतनी दूरी क्यों होनी चाहिए? जहां सुरक्षा के मद््देनजर छात्राओं को शाम ढले छात्रावास से बाहर न निकलने की नसीहत दी जा रही हो, वहां के प्रशासन से असुरक्षा के असल कारणों को दूर करने तथा सुरक्षा-उपायों को पुख्ता करने और अपनी जिम्मेवारी को गंभीरता से लेने की कितनी उम्मीद की जा सकती है!

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