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बर्बर सलूक

तमाम विकास और प्रगति के दावों के बावजूद हमारे समाज में ऐसी घटनाएं होती रहती हैं, जिन्हें बर्बरता ही कहा जा सकता है।

Author May 23, 2017 4:33 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है।

तमाम विकास और प्रगति के दावों के बावजूद हमारे समाज में ऐसी घटनाएं होती रहती हैं, जिन्हें बर्बरता ही कहा जा सकता है। रविवार को मुंबई से सटे उल्हासनगर में एक ऐसी घटना घटी, जो स्तब्ध करने वाली है। स्नैक्स (चकली) का एक पैकेट चुरा लेने पर दुकानदार ने अपने बेटों के साथ मिल कर दो किशोरों को निर्वस्त्र कर, उनके गले में चप्पलों की माला पहना कर गली में घुमाया और उनका वीडियो भी बनाया। इससे पहले आठ और नौ साल के इन दोनों बच्चों का आधा सिर भी मूड़ा गया। पुलिस ने दुकानदार और उसके दो बेटों को गिरफ्तार कर लिया है। अक्तूबर, 2016 में बिहार के बेगूसराय में सिगरेट का पैकेट चोरी करने का आरोप लगा कर कुछ लोगों ने एक बच्चे को निर्वस्त्र कर पीटा था और उसे अधमरा करके छोड़ गए थे। कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में एक बालिका विद्यालय में सत्तर छात्राओं की उनकी छात्रावास अधीक्षक ने कपड़े उतरवा कर जांच की थी। आखिर ये समाज के किस दिशा में जाने के लक्षण हैं?

सवाल और भी हैं। क्यों किसी को लगता है कि वह प्रशासन की नजर से दूर है, और कुछ भी कर गुजरे, उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा? कम से कम ऐसे अपराध, जहां कोई संगठित मंशा और सचेतन इरादा काम नहीं कर रहा है, उन अपराधों को तत्काल रोका जा सकता है। जरूरत सिर्फ लोगों को जागरूक करने की होती है। इस घटना को अगर एक नमूने के तौर लें तो पाएंगे कि दोनों बच्चे बेहद गरीब मां-बाप के हैं और दुकानदार भी अल्पशिक्षित और छोटे तबके से ताल्लुक रखता है। ऐसे लोग जब अपराधों को अंजाम दे रहे होते हैं तो उन्हें शायद यह अहसास ही नहीं रहता कि वे कितना बड़ा अपराध कर रहे हैं? उस वक्त उन पर एक उन्माद हावी रहता है, जो विवेक को हर लेता है। बाद में उस दुकानदार को भी अहसास हुआ होगा कि जिस बात पर उसने इतना बड़ा अपराध कर डाला वह मामूली-सी बात थी।

दो गरीब बच्चों ने एक स्नैक्स चुराया था। इस पर दो-चार थप्पड़ मारना भी अत्याचार लगेगा, पर एक आदमी अपना आपा खो बैठा, और एक संगीन अपराध की हद तक चला गया। इस घटना का सबसे दुखद पहलू यह रहा कि एक पीड़ित बच्चे की मां, जो घरेलू नौकरानी है, ने बताया कि जब इन बच्चों को नंगा किया गया और उनका जुलूस निकाला गया तो बहुत-से लोग वहां मौजूद थे। पर वे लोग तमाशबीन बने रहे। क्या इसलिए कि वे बच्चे एक वर्ग से ताल्लुक रखते थे जिसे समाज के हाशिये का या हाशिये से बाहर का भी वर्ग कहा जा सकता है। क्या यह घटना गरीबों के प्रति समाज में घटती जा रही हमदर्दी की मिसाल नहीं है? साथ ही, यह समाज में विवेक के क्षरण का भी उदाहरण है जिसे यह बोध न हो कि किस गलती पर कैसी प्रतिक्रिया होनी चाहिए। यों इस घटना को गरीबी के कोण से भी देख सकते हैं। विकास के तमाम दावों के बावजूद देश के बहुत-से बच्चे इतने अभाव और वंचना में जीते हैं कि दुकान में रखे स्नैक्स को खरीद नहीं सकते।

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