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अयोध्या का कठघरा

आखिरकार विवादित बाबरी मस्जिद ध्वंस मामले में विशेष अदालत ने लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती सहित बारह लोगों के खिलाफ आरोप तय कर दिया।

Author June 1, 2017 4:59 AM
Aatal Bihari Vajpayee: छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में कार सेवकों द्वारा बाबरी मस्जिद को गिराए जाने की घटना वाजपेयी के लिए इस बात की अग्नि परीक्षा थी कि धर्मनिरपेक्षता के पैमाने पर वह कहां खड़े हैं। उस समय वाजपेयी लोकसभा में विपक्ष के नेता थे। वाजपेयी ने अनेक भाजपा नेताओं के रुख के विपरीत स्पष्ट शब्दों में इसकी निंदा की थी। उनकी निजी निष्ठा पर कभी गंभीर सवाल नहीं उठाये गए। (फ़ोटो-एक्सप्रेस आर्काइव)

आखिरकार विवादित बाबरी मस्जिद ध्वंस मामले में विशेष अदालत ने लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती सहित बारह लोगों के खिलाफ आरोप तय कर दिया। उन पर मुकदमा चलेगा। डेढ़ महीने पहले सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले से जुड़े सभी मुकदमों को एक जगह इकट्ठा करके सुनवाई का आदेश दिया था। उसी संदर्भ में प्रक्रिया शुरू हो गई है। निचली अदालतें और उच्च न्यायालय इनमें से ज्यादातर आरोपियों को बरी कर चुके थे, पर सीबीआइ ने अपनी जांच में स्पष्ट कहा कि बाबरी मस्जिद गिराने के दलिए साजिश रचने में इन लोगों का हाथ था, लिहाजा इनके खिलाफ मुकदमा चलना चाहिए। सीबीआइ ने इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय में गुहार लगाई थी और उसने सीबीआइ के पक्ष को सही मानते हुए नए सिरे से मुकदमा चलाने का आदेश दिया था। इस मामले की सुनवाई दो साल के भीतर पूरी हो जानी है। इस तरह बाबरी ध्वंस मामले में संतोषजनक निर्णय आने की उम्मीद बनी है।

सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले पर दुबारा सुनवाई करने का आदेश दिया तो विपक्षी दलों को राजनीति करने का मौका मिल गया था। कुछ लोगों ने कहा कि लालकृष्ण आडवाणी को राष्ट्रपति पद की दौड़ से हटाने के मकसद से मोदी सरकार ने यह पत्ता फेंका है। मगर उसमें दम नजर नहीं आया। अब मांग उठ रही है कि उमा भारती को अपने पद से नैतिक आधार पर इस्तीफा दे देना चाहिए, जो कि उचित कहा जा सकता है। जब यह मुकदमा दायर हुआ, तो लालकृष्ण आडवाणी ने खुद नैतिक आधार पर अपने को सरकारी जिम्मेदारियों से अलग कर लिया था। इसलिए उमा भारती से ऐसी अपेक्षा स्वाभाविक है। सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीआइ की याचिका स्वीकार करते हुए बाबरी मस्जिद ध्वंस मामले की सुनवाई का आदेश दिया तो उमा भारती ने कहा भी कि साजिश के तहत नहीं, बल्कि वे खुल्लम खुल्ला बाबरी मस्जिद गिराने के आंदोलन में शामिल थीं।

राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में इसलिए भी उचित निर्णय की अपेक्षा की जाती है कि वह अभियान राजनीतिक लाभ लेने के मकसद से चलाया गया था। उसमें अदालत के फैसले का इंतजार नहीं किया गया। बाबरी मस्जिद ढहा कर एक समुदाय की भावनाओं को जानबूझ कर आहत किया गया। यह सही है कि बड़ी संख्या में लोगों ने इकट्ठा होकर विवादित ढांचे को गिरा दिया था, मगर उसकी पृष्ठभूमि तैयार करने में जिन लोगों का हाथ था, वह भी छिपा नहीं है। लालकृष्ण आडवाणी ने इसके लिए देश भर में रथयात्रा निकाली थी। इसलिए अदालत ने स्वाभाविक रूप से भाजपा के आरोपी नेताओं की यह दलील नहीं मानी है कि विवादित ढांचे को गिराने की साजिश में उनका हाथ नहीं था। भाजपा पर पिछले पच्चीस सालों से बाबरी मस्जिद ढहाने का कलंक है। इसे लेकर दूसरे दल मुसलिम समुदाय के लोगों को बरगलाने का प्रयास भी करते रहे हैं। इसलिए अब भाजपा या फिर अन्य दलों को अदालत की कार्यवाही के समय इसे राजनीतिक रंग देने का प्रयास करने के बजाय फैसले का इंतजार करना चाहिए। अब पहले से स्थितियां काफी बदल गई हैं। राम मंदिर निर्माण को लेकर मुसलिम समुदाय के बीच से भी सकारात्मक प्रतिक्रियाएं आने लगी हैं। आम सहमति से इस मसले को हल करने की बात हो रही है। मगर इसका यह अर्थ कतई नहीं लगाया जाना चाहिए कि पच्चीस साल पहले जो अयोध्या कांड हुआ था, उसके दोष खत्म हो गए हैं।

 

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