jansatta editorial about army chief vipin rawat statement - Jansatta
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विरल विवाद

राजनीतिकों के बयान जब-तब विवाद का विषय बनते रहते हैं। पर सेना प्रमुख की किसी बात को लेकर विवाद खड़ा होना एक विरल घटना ही कही जाएगी।

Author February 20, 2017 2:58 AM
थल सेनाध्यक्ष बिपिन रावत की फाइल फोटो

राजनीतिकों के बयान जब-तब विवाद का विषय बनते रहते हैं। पर सेना प्रमुख की किसी बात को लेकर विवाद खड़ा होना एक विरल घटना ही कही जाएगी। सेना हमारे राज्यतंत्र का सबसे अनुशासित अंग है और सबसे ज्यादा गैर-राजनीतिक भी। ऐसे में सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत के एक बयान को लेकर पिछले हफ्ते सियासी तापमान चढ़ गया, तो इसे सामान्य मामला नहीं कहा जा सकता। जनरल रावत ने सेना के आतंकवाद-विरोधी अभियान के दौरान राह में आने वाले और पत्थर फेंकने वाले घाटी के नौजवानों को सख्त चेतावनी दी थी, यह कहते हुए कि जो आतंकवादियों के समर्थन में आगे आते हैं उन्हें राष्ट्र-विरोधी तत्त्व मान कर उनसे कड़ाई से निपटा जाएगा। सेना प्रमुख ने ऐसा कहने की जरूरत क्यों महसूस की होगी? इसलिए कि पत्थर फेंकने वाले नौजवानों के बीच में आ जाने से आतंकवादी-विरोधी कार्रवाई के दौरान बाधा पड़ती है। यही नहीं, और भी ज्यादा गंभीर नुकसान सेना को हुआ है; ऐसे मौकों पर अपने कई जवानों को उसे खोना पड़ा है। सुरक्षा बलों को पत्थरबाजी का सामना तब भी करना पड़ता है जब वे कहीं तलाशी अभियान पर निकले होते हैं। लिहाजा, सेना प्रमुख की टिप्पणी का संदर्भ समझा जा सकता है।

लेकिन सेना के सर्वोच्च पद पर बैठा व्यक्ति जब कुछ कहता है तो उसे एक नीतिगत बयान की तरह देखा जाता है और वह हर पहलू से विचार का विषय होता है। इसलिए सेना प्रमुख को अपने शब्द सावधानी से चुनने चाहिए। उनके बयान से जाने-अनजाने जैसी धारणा बनी वह दुर्भाग्यपूर्ण है। सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी करने वाले घाटी के युवकों को गुमराह माना जा सकता है, उनकी नाराजगी के गलत-सही कारण हो सकते हैं, यह भी सोचा जा सकता है कि क्या पता उनमें से कुछ किसी के बहकावे में आ गए हों या किसी षड्यंत्र के शिकार हों। मगर वे लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद और आइएस के हथियारबंद आतंकवादी नहीं हैं। दोनों में फर्क किया जाना चाहिए, वरना अंतत: आतंकवादी गुटों को ही फायदा होगा। दोनों के बीच कोई फर्क नहीं करना न तो कानूनी रूप से उचित ठहराया जा सकता है न राजनीतिक दृष्टि से। कश्मीर में क्या हो रहा है और कश्मीर की बाबत कब क्या कहा जाता है और क्या कदम उठाया जाता है इस पर सारी दुनिया की नजर रहती है। इसलिए भी कुछ ऐसा नहीं कहा जाना चाहिए जो बेहद दमनकारी प्रतीत हो या माहौल बिगाड़ने की ताक में रहने वालों को बहाना मिले।

पीडीपी हमेशा घाटी के लोगों से संवाद करने की हिमायती रही है। वह इस बात की भी वकालत करती रही है कि घाटी में स्थायी रूप से शांति कायम करने की चुनौती को एक राजनीतिक मसले की तरह देखा जाना चाहिए, न कि केवल बल प्रयोग का। आज उसी पीडीपी के साथ, और उसी के नेतृत्व में, भाजपा जम्मू-कश्मीर की सत्ता में साझेदार है। दोनों दलों ने जो ‘गठबंधन का एजेंडा’ जारी किया था उसे क्यों ठंडे बस्ते में डाल रखा है? यह सही है कि पिछले साल घाटी में बेहद असामान्य हालात हो गए थे और कोई संवाद संभव नहीं दिखता था। मगर, पत्थरबाजी की घटनाएं भले अब भी होती हों, 1990 से 2008 के दौर के मुकाबले हालात कम खराब कहे जाएंगे। फिर गठबंधन के साझा एजेंडे की दिशा में कोई पहल क्यों नहीं हो रही!

 

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