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खाड़ी संकट

खाड़ी के अधिकतर देश अपनी-अपनी पसंद के चरमपंथी और आतंकी गुटों की मदद करते रहे हैं। मसलन, सीरिया में सलाफी गुटों को सऊदी अरब से मदद मिलती रही है तो इस्लामी ब्रदरहुड के हथियारबंद संगठन को कतर से।

Author June 7, 2017 07:40 am
इस्लामिक स्टेट के आतंकी। (फाइल फोटो)

सऊदी अरब, बहरीन, यमन, संयुक्त अरब अमीरात और मिस्र ने खाड़ी क्षेत्र के एक अन्य देश कतर से राजनयिक रिश्ते खत्म कर लिए, यह कहते हुए कि कतर मुसलिम ब्रदरहुड, अल कायदा और आइएस जैसे आतंकी संगठनों और चरमपंथियों की मदद कर रहा है और उसके इस रवैए से समूचे क्षेत्र में अस्थिरता का संकट पैदा हो सकता है। यह आरोप निराधार हो या नहीं, विरोधाभासी जरूर है। जिन देशों ने कतर को कठघरे में खड़ा किया है उनका भी दामन पाक-साफ नहीं कहा जा सकता। दरअसल, खाड़ी के अधिकतर देश अपनी-अपनी पसंद के चरमपंथी और आतंकी गुटों की मदद करते रहे हैं। मसलन, सीरिया में सलाफी गुटों को सऊदी अरब से मदद मिलती रही है तो इस्लामी ब्रदरहुड के हथियारबंद संगठन को कतर से। मजे की बात यह है कि सीरिया में सऊदी अरब और कतर, दोनों का मकसद एक ही रहा है, बशर अल-असद को सत्ता से बेदखल करना। इस पृष्ठभूमि को देखते हुए कतर पर लगाए गए आरोप को स्वाभाविक ही दुनिया ने गंभीरता से नहीं लिया है।

कतर के खिलाफ खाड़ी के ही कुछ देशों ने जो मोर्चा खोला है उसके पीछे आपसी तनाव, मतभेद और बनते-बिगड़ते कूटनीतिक समीकरण ही मुख्य कारण हैं। यों करीब तीन साल पहले भी सऊदी अरब, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात ने कतर से अपने राजनयिक अस्थायी तौर पर बुला लिए थे, पर राजनयिक संबंध तोड़ लेना ज्यादा बड़ी घटना है और इसका न केवल पश्चिम एशिया के कारोबारी और भू-राजनीतिक रिश्तों पर, बल्कि विश्व व्यापार और विश्व कूटनीति पर भी असर पड़ेगा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें चढ़ सकती हैं। प्राकृतिक गैस की भी। और भी कई चीजों का आयात-निर्यात प्रभावित हो सकता है। भारत का चिंतित होना स्वाभाविक है, क्योंकि एक तो इन देशों में बड़ी संख्या में भारतीय कामगार काम करते हैं, और दूसरे, इन देशों से भारत का व्यापारिक संबंध भी प्रगाढ़ है। भारत सबसे ज्यादा कच्चा तेल सऊदी अरब से मंगाता है और सबसे ज्यादा प्राकृतिक गैस कतर से। इसलिए भी भारत यही चाहेगा कि ये देश जल्द आपसी तनाव खत्म करें और राजनयिक रिश्ते बहाल करें। आखिर इनके रिश्ते इस हद तक क्यों बिगड़ गए? दरअसल, खाड़ी देशों की एक धुरी सऊदी अरब है तो दूसरी धुरी है ईरान। दोनों की प्रतिद्वंद्विता पुरानी है। सऊदी अरब इस वक्त कतर से बेहद खफा दिख रहा है तो इसका एक मुख्य कारण ईरान की तरफ कतर का रुझान है।

पिछले दिनों कतर के शासक शेख तमीम बिन हमद अल थानी ने ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी से फोन पर बातचीत की, तो यह सऊदी अरब को हजम नहीं हुआ। फिर, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ईरान-विरोधी तेवर से भी सऊदी अरब का हौसला बढ़ा होगा। अब ट्रंप भले खाड़ी देशों को आपसी मतभेद सुलझाने की नसीहत दे रहे हों, पर उनके ईरान-विरोधी एजेंडे का माहौल बिगाड़ने में कम योगदान नहीं है। ईरान से अमेरिका के रिश्ते लंबे समय से तनावपूर्ण थे, पर ईरान की कमान हसन रूहानी के हाथ में आने के बाद दोनों देशों के रिश्तों में एक ऐतिहासिक बदलाव आया। ईरान ने अपना विवादास्पद परमाणु कार्यक्रम छोड़ने की घोषणा कर दी और इसी के साथ दुनिया से उसके अलग-थलग रहने का दौर भी समाप्त हो गया। ओबामा के समय हासिल हुई इस उपलब्धि पर ट्रंप ने पानी फेर दिया है। ट्रंप के रुख से उत्साहित सऊदी अरब की मंशा शिया ईरान के खिलाफ सुन्नी देशों को अपने पीछे एकजुट करने की होगी। लेकिन इस व्यर्थ की तनातनी और तनाव से किसी का भी भला नहीं होगा।

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