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धर्मांतरण के विरुद्

राजस्थान, मध्यप्रदेश, हिमाचल और छत्तीसगढ़ में इस तरह के विधेयक को पहले ही मंजूरी दी चुकी है।
Author August 3, 2017 05:39 am
झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास। (Image Source – PTI)

झारखंड में भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने एक ऐसे विधेयक के प्रारूप को मंजूरी दी है जिसके तहत राज्य में लालच देकर या भय दिखाकर किसी का धर्मांतरण कराना अपराध माना जाएगा। ‘झारखंड धर्म स्वातंत्र्य विधेयक, 2017’ नामक विधेयक के प्रारूप की धारा तीन में कठोर दंड और जुर्माने का भी प्रावधान किया गया है। इस महीने में शुरू होने वाले मानसून सत्र में इस विधेयक को विधानसभा में पेश किया जाएगा, जहां पारित होने के बाद यह कानूनी शक्ल ले लेगा। राजस्थान, मध्यप्रदेश, हिमाचल और छत्तीसगढ़ में इस तरह के विधेयक को पहले ही मंजूरी दी चुकी है। जल्द ही झारखंड भी इसी पांति में शामिल हो जाएगा। विधेयक में कहा गया है कि अगर कोई लालच देकर या जबरन किसी का धर्मांतरण कराता है तो उसे तीन साल के कारावास और पचास हजार रुपए जुर्माना की सजा होगी। और यदि अनूसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति या किसी नाबालिग लड़की का धर्मांतरण कराया जाता है तो दोषी को चार साल का कारावास और एक लाख रुपए जुर्माने की सजा होगी। असल में, भारतीय जनता पार्टी और कई हिंदूवादी संगठन अरसे से देश में आदिवासियों और अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के लोगों का धर्मांतरण कराने का आरोप लगाते रहे हैं।

खासकर, आदिवासी क्षेत्रों में ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्मांतरण कराने का मुद्दा लगातार उठता रहा है। इस मामले को लेकर कुछ कट्टरपंथी हिंदू संगठनों के ऊपर ईसाई मिशनरियों और गिरजाघरों पर हमले करने के आरोप भी लगते रहे हैं। जनवरी 1999 में ओडिशा में आस्ट्रेलिया के पादरी ग्राहम स्टैंस और उनके दो नाबालिग बच्चों को उस समय जिंदा जला कर मार दिया गया था, जब वे अपने गाड़ी में सो रहे थे। हमलावरों का कहना था कि ग्राहम स्टैंस आदिवासियों को लालच देकर उन्हें ईसाई बना रहे थे। इस मामले में एक कट्टरपंथी हिंदू संगठन के एक कार्यकर्ता को दोषी पाया गया था और उसे अदालत ने उम्रकैद की सजा भी दी थी। भारतीय जनता पार्टी के लिए धर्मांतरण शुरू से ही एक गंभीर मुद्दा रहा है। इसलिए भाजपा शासित राज्यों में धर्मांतरण को रोकने के लिए कानूनी कवच की व्यवस्था करना कोई आश्चर्यजनक नहीं है।

समझा जाता है कि छत्तीसगढ़ सरकार इसी दिशा में अपने कदम बढ़ा रही है। गौरतलब है कि झारखंड आदिवासी जनजाति बहुल राज्य है, लेकिन वहां बड़ी संख्या में हिंदू और मुसलिम समुदाय के लोग भी रहते हैं। राज्य में ईसाई मिशनरियां भी काफी सक्रिय रहती हैं। हालांकि मिशनरियों का कहना है कि वे गरीब-बीमार आदिवासियों की सेवा में लगी रहती हैं। लेकिन यह भी हकीकत है कि काफी संख्या में आदिवासी ईसाई भी बने हैं। इस विधेयक के प्रारूप की मंजूरी मिलने पर ईसाई संगठनों या स्थानीय गिरजाघरों की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई है। मगर माना जा रहा है कि इसे लेकर ईसाई संगठन खुश नहीं हैं क्योंकि उन्हें आशंका है कि वे इस कानून के आसान शिकार बनाए जा सकते हैं। रांची के आर्कबिशप कार्यालय की ओर से कहा गया है कि वह मसविदे का अध्ययन कर रहा है। राज्य की 3.29 करोड़ आबादी में करीब 21 फीसद आबादी सरना धर्मावलंबियों की है, जो न तो ईसाई हैं और न ही खुद को हिंदू मानते हैं। वे प्रकृति पूजक आदिवासी हैं और काफी समय से अपने लिए अलग धर्म संहिता बनाने की मांग कर रहे हैं। सरना समिति के एक सदस्य ने इस विधेयक का स्वागत किया है।

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