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संपादकीय: दुरुस्त आयद

लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, सिपह-ए-सहाबा से लेकर हक्कानी गुट तक भारत और अफगानिस्तान को निशाना बनाने के साथ ही अमेरिकी हितों पर भी चोट करते रहे हैं।

Author September 22, 2016 05:36 am
यूएस सेक्रेटरी जॉन केरी से मिले नवाज शरीफ (Photo Source: Twitter/Fara Qureshi)

एक बार फिर अमेरिका ने कहा है कि वह पाकिस्तान पर उसकी सीमा के अंदर पनाह लेने वाले आतंकी समूहों से निपटने में अतिरिक्त कदम उठाने के लिए दबाव डालेगा। अमेरिका की ओर से इस तरह का बयान आना कोई नई बात नहीं है। इस आशय के उसके बहुत-से बयान याद किए जा सकते हैं। फिर भी, अमेरिका का ताजा बयान भारत के लिए बहुत मायने रखता है, क्योंकि यह उड़ी में हुए आतंकी हमले की पृष्ठभूमि में आया है जिसने अठारह भारतीय सैनिकों की जान ले ली। पाकिस्तान पर दबाव डालने के लिए अमेरिका क्या कदम उठाएगा, फिलहाल इस बारे में कोई संकेत उसकी तरफ से नहीं आया है, पर उसका ताजा बयान इस तरफ जरूर इशारा करता है कि उड़ी हमले की वजह से पाकिस्तान को लेकर उसकी चिंता बढ़ी है। मजे की बात यह है कि यह बयान अमेरिकी विदेशमंत्री जॉन केरी से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की मुलाकात के बाद आया है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा के इकहत्तरवें अधिवेशन से इतर हुई इस द्विपक्षीय बैठक में जहां शरीफ ने कश्मीर में मानवाधिकार हनन का मसला उठाया, वहीं उड़ी हमले की बाबत भारत के आरोपों पर अपनी सफाई भी पेश की। इसके बावजूद, अमेरिका ने आतंकी गुटों के खिलाफ कमर कसने के लिए पाकिस्तान पर दबाव डालने का भरोसा दिलाया है तो यह भारत के प्रति समर्थन के साथ-साथ यह भी बताता है कि उसकी नजर में पाकिस्तान की विश्वसनीयता कितनी है। दरअसल, अमेरिका खुद भुक्तभोगी है। उसका सबसे बड़ा दुश्मन उसामा बिन लादेन कहां छिपा बैठा था, इसे वह कैसे भुला सकता है! 2008 में मुंबई में हुए आतंकी हमले में कुछ अमेरिकी नागरिक भी मारे गए थे। लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, सिपह-ए-सहाबा से लेकर हक्कानी गुट तक भारत और अफगानिस्तान को निशाना बनाने के साथ ही अमेरिकी हितों पर भी चोट करते रहे हैं। पर तमाम कटु अनुभवों के बावजूद आतंकवाद विरोधी अपने अंतरराष्ट्रीय गठबंधन में अमेरिका ने पाकिस्तान को भी शामिल कर लिया।

इससे अमेरिका की मुहिम की साख को तो चोट पहुंची, पाकिस्तान को दोहरा खेल खेलने का मौका मिल गया। एक तरफ वह कश्मीर में आतंकवाद का रणनीतिक इस्तेमाल करता रहा है, और दूसरी तरफ यह दावा भी दोहराता रहता है कि वह तो खुद आतंकवाद से पीड़ित है और आतंकवाद विरोधी अंतरराष्ट्रीय गठबंधन में हिस्सेदार है। पाकिस्तान को यह आवरण अमेरिका ने ही सुलभ कराया है। वरना पाकिस्तान को अलग-थलग करना कब का संभव हो चुका होता। उसामा के पाकिस्तान में छिपे पाए जाने और वहां आतंकी संगठनों के अड््डे होने का हवाला देकर दो अमेरिकी सांसदों ने पाकिस्तान को ‘आतंक प्रायोजक देश’ घोषित करने के लिए अपनी प्रतिनिधि सभा में एक विधेयक पेश किया है। इन दो सांसदों में एक का नाता रिपब्लिकन पार्टी से है और एक का डेमोक्रेटिक पार्टी से, और दोनों आतंकवाद विषयक संसदीय समिति के भी सदस्य हैं। इस विधेयक का हश्र क्या होगा, सबको मालूम है। असल में, जब तक अमेरिका इस व्यामोह से मुक्त नहीं हो जाता कि अफगानिस्तान में स्थिरता और शांति के लिए पाकिस्तान का सहयोग जरूरी है, तब तक वह आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई के लिए पाकिस्तान पर एक हद से ज्यादा दबाव नहीं डाल सकता। लिहाजा, अगर अमेरिका अपने ताजा बयान को तार्किक परिणति तक पहुंचाना चाहता है तो उसे सबसे पहले अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी अपनी रणनीति की विसंगतियों पर गौर करना होगा।

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