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संपादकीय : समझौता और अंदेशे

रोहिंग्या मुसलमानों की आबादी करीब दस लाख है और ये रखाइन प्रांत में रहते आए हैं। इन लोगों को बांग्लादेश से भाग कर आए समुदाय के रूप में देखा जाता है। इन्हें म्यांमा की नागरिकता भी हासिल नहीं है। देश में कई बार बौद्धों और रोहिंग्या लोगों के बीच टकराव और हिंसा की गंभीर घटनाएं हुई हैं।

Author June 8, 2018 4:56 AM
रोहिंग्या मुसलमानों की आबादी करीब दस लाख है और ये रखाइन प्रांत में रहते आए हैं। इन लोगों को बांग्लादेश से भाग कर आए समुदाय के रूप में देखा जाता है।(Source: Reuters)

रोहिंग्या मुसलमानों की वतन-वापसी के लिए संयुक्त राष्ट्र और म्यांमा के बीच समझौता हो गया है। इसे संयुक्त राष्ट्र की बड़ी उपलब्धि कहा जा सकता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि हाल तक म्यांमा के हालात को लेकर यह वैश्विक निकाय खुद संतुष्ट नजर नहीं आ रहा था। दूसरी तरफ, म्यांमा इस बात पर अड़ा हुआ था कि वह किसी भी सूरत में रोहिंग्या मुसलमानों को देश में नहीं घुसने देगा। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाते हुए म्यांमा को रोहिंग्याओं के मसले पर झुका लेना संयुक्त राष्ट्र की बड़ी कामयाबी है। इस समझौते से यह उम्मीद बनती है कि रोंहिग्या मुसलमानों के म्यांमा लौट पाने का रास्ता साफ होगा। हालांकि अभी यह दावा करना जल्दबाजी होगी कि इस समझौते से रोंहिग्या समस्या का समाधान हो जाएगा। संयुक्त राष्ट्र और म्यांमा में जो समझौता हुआ है, उसमें कहा गया है कि रोहिंग्या शरणार्थियों की स्वैच्छिक, सुरक्षित और सम्मानजनक वापसी के लिए परिस्थितियां बनाई जाएं और इसके लिए म्यांमा एक खाका तैयार करे कि कैसे वह इस पर अमल करेगा।

म्यांमा बौद्ध बहुल देश है। रोहिंग्या मुसलमानों की आबादी करीब दस लाख है और ये रखाइन प्रांत में रहते आए हैं। इन लोगों को बांग्लादेश से भाग कर आए समुदाय के रूप में देखा जाता है। इन्हें म्यांमा की नागरिकता भी हासिल नहीं है। देश में कई बार बौद्धों और रोहिंग्या लोगों के बीच टकराव और हिंसा की गंभीर घटनाएं हुई हैं। लेकिन पिछले छह साल के दौरान हालात ज्यादा बिगड़ गए। पिछले पांच साल के दौरान करीब सात लाख रोहिंग्या म्यांमा छोड़ चुके हैं और शरणार्थी के रूप में भटकने को मजबूर हैं। म्यांमा सेना ने कई बार रखाइन में दमनात्मक कार्रवाई का अभियान चलाया, बड़ी संख्या में घर फूंक डाले, निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतार दिया और महिलाओं का यौन उत्पीड़न किया। बड़ी संख्या में रोहिंग्या बांग्लादेश, भारत और मलेशिया में शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं। म्यांमा की फौज ने इस समुदाय के खिलाफ जो बेहद दमनकारी अभियान चलाया, उसे संयुक्त राष्ट्र ने ‘जातीय सफाया’ करार दिया था।

इसमें दो राय नहीं कि रोहिंग्या मुसलमानों की म्यांमा-वापसी और उनका सुरक्षित पुनर्वास सुनिश्चित करना संयुक्त राष्ट्र के लिए एक कठिन और जोखिमभरा कार्य साबित होगा। म्यांमा ने संयुक्त राष्ट्र के साथ जो समझौता किया है, वह अंतरराष्ट्रीय बिरादरी और सुरक्षा परिषद के दबाव की देन है। हकीकत यह है कि म्यांमा किसी भी सूरत में रोहिंग्या मुसलमानों की वापसी नहीं चाहता। म्यांमा के सेना प्रमुख भी साफ कर चुके हैं कि देश लौटने वाले रोहिंग्या तभी तक सुरक्षित रहेंगे जब तक वे उनके लिए बनाए गए निर्धारित क्षेत्रों में रहेंगे। यानी रोहिंग्याओं के लिए अब अलग से बस्तियां होंगी। रोहिंग्याओं के पुनर्वास को लेकर म्यांमा सेना प्रमुख का बयान एक तरह का खौफ ही पैदा करता है। हैरानी की बात तो यह है कि रोहिंग्या समस्या को लेकर म्यांमा की कथित लोकतांत्रिक सरकार ने भी कोई तार्किक और सद्भावपूर्ण कदम उठाने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। देश में लोकतंत्र बहाली के लिए बरसों आंदोलन चलाने वाली आंग सान सू की की सरकार ने न सिर्फ इस मुसलिम समुदाय को बल्कि वैश्विक समुदाय को भी हैरान किया। जाहिर है सरकार सेना के आगे झुकी है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर रोहिंग्या लौटने भी लगे तो उनकी सुरक्षा की गांरटी कौन लेगा?

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