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देश के राजनीतिक परिदृश्य में नेताओं के बेलगाम बोल कोई नई बात नहीं है।

Author December 14, 2016 11:15 PM
किरण रिजिजू केंद्रीय गृह राज्यमंत्री हैं। (file photo)

देश के राजनीतिक परिदृश्य में नेताओं के बेलगाम बोल कोई नई बात नहीं है। अनेक ऐसे उदाहरण हैं, जिनमें किसी नेता ने अपने किसी प्रतिद्वंद्वी या महिलाओं को लेकर ऐसे बयान दिए, जिसे काफी आपत्तिजनक माना गया। मगर न इस प्रवृत्ति में कमी आई है, न ऐसे बोल बोलने वाले नेताओं के भीतर कोई अफसोस का भाव देखा जा रहा है। उलटे ऐसे राजनीतिक भी हैं, जिन्होंने किसी आरोप पर प्रतिक्रिया देते हुए इस बात का भी खयाल रखना जरूरी नहीं समझा कि वे किसी जिम्मेदार पद पर हैं और उनके मुंह से निकली बात को सामान्य तरीके से नहीं देखा जाएगा। गृहराज्य मंत्री किरन रिजीजू को आमतौर पर एक सहज और शालीन व्यक्ति के रूप में देखा जाता है। लेकिन अरुणाचल प्रदेश में एक ऊर्जा परियोजना के तहत बांध के निर्माण में करीब साढ़े चार सौ करोड़ रुपए के घोटाले से जुड़ी खबर में नाम आने के बाद उन्होंने जो बयान दिया, उसे उनकी हताशा के रूप में देखा जा सकता है। यह न केवल उनकी, बल्कि उनके पद की गरिमा को भी कम करता है। अगर इस आरोप के बाद कांग्रेस या किसी अन्य दल के नेता जांच की मांग कर रहे हैं और वे खुद को निर्दोष मानते हैं तो उन्हें आगे बढ़ कर स्थिति को साफ करना चाहिए। लेकिन इसके उलट धमकी के लहजे में बात करना उन पर उठे सवालों की तीव्रता को और गहरा करता है।

भारतीय राजनीति में किसी घोटाले में नाम आना या आरोप लगना कोई नई बात नहीं है। ऐसे अनेक मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें किसी घोटाले का आरोप सामने आने के बाद एक सामान्य कानूनी प्रक्रिया के तहत मामला आगे बढ़ता है, उसकी जांच होती है और उसमें शामिल आरोपियों को या तो दोषी पाया जाता है या फिर वह उससे पाक-साफ बाहर निकलता है। लेकिन भ्रष्टाचार के किसी मामले में नाम आने के बाद खुद आगे बढ़ कर उसकी जांच की मांग करने के बजाय खबर को उजागर करने वालों के लिए अपमानजनक भाषा में धमकी का इस्तेमाल करना हैरान करता है। खासतौर पर इसलिए भी कि किरन रिजीजू देश के गृहराज्य मंत्री हैं और किसी भी मसले पर उनसे एक परिपक्व बयान की उम्मीद की जाती है। किसी आरोप का साबित होना अंतिम तौर पर अदालत में तय होता है। सवाल है कि अगर तथ्य के रूप में कहीं यह खबर आई है, जिसमें किसी घोटाले के संदर्भ में वे भी कठघरे में हैं, तो क्या इसका जवाब धमकी के रूप में दिया जाएगा!

दरअसल, किरन रिजीजू का बयान वैसे नेताओं का प्रतिनिधि उदाहरण है, जो कई बार बेहद संवेदनशील मसलों पर टिप्पणी करते हुए भी यह नहीं सोचते कि उनका बयान समाज के किसी तबके को अपमानित करने वाला है, किसी संवेदनशील मसले की गंभीरता को कम रहा है या फिर खुद उनके व्यक्तित्व को हल्का बनाता है। ऐसे माामले भी सामने आ चुके हैं कि किसी नेता ने महज अपनी राजनीति साधने के लिए कोई बेतुकी या उकसाने वाली बात कह दी और उसकी वजह से समाज के दो वर्गों के बीच तनाव तक पैदा हो गया। यह ध्यान रखने की बात है कि जनप्रतिनिधियों या नेताओं का सार्वजनिक आचरण और जाहिर किए गए उनके विचार जनता का राजनीतिक प्रशिक्षण भी होते हैं। नेताओं का व्यवहार और उनके बयान से सामान्य लोगों के सोचने-समझने की दिशा भी बनती है।

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