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विज्ञापन में सरकार

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार शुरू से फिजूलखर्ची पर लगाम लगाने और सादगी का दावा करती आ रही है, पर अब उस पर से परदा उतरता दिख रहा है। खासकर सरकारी कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार के बहाने विज्ञापनों पर जिस तरह करोड़ों रुपए बहाए जा रहे हैं, उससे यही लगता है कि या तो […]

Author August 5, 2015 02:05 am
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार शुरू से फिजूलखर्ची पर लगाम लगाने और सादगी का दावा करती आ रही है, पर अब उस पर से परदा उतरता दिख रहा है। खासकर सरकारी कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार के बहाने विज्ञापनों पर जिस तरह करोड़ों रुपए बहाए जा रहे हैं, उससे यही लगता है कि या तो आम आदमी पार्टी के भीतर अपने कामकाज को लेकर आत्मविश्वास की कमी है या फिर इस मामले में वह भाजपा को पीछे छोड़ देना चाहती है।

भारी बहुमत से चुनाव जीत कर सरकार बनाने के बाद अपने पहले बजट में ही अरविंद केजरीवाल ने अकेले विज्ञापन के मद में पिछली सरकारों के खर्च के मुकाबले इक्कीस गुना इजाफा कर दिया। यह अपने आप में उसके सरोकारों पर सवालिया निशान है। इसे लेकर स्वाभाविक ही राजनीतिक हलकों में तीखी आपत्तियां उभरीं और दिल्ली कांग्रेस के अध्यक्ष अजय माकन ने उच्च न्यायालय में इस पर जनहित याचिका दाखिल कर सरकार की ओर से टीवी, रेडियो और अखबारों में दिए जा रहे विज्ञापनों पर रोक लगाने की मांग की।

जब अदालत ने ‘आप’ सरकार से जवाब तलब किया तो उसने जवाब दिया कि तेरह मई के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पिछले तीन महीने में अब तक उसने सिर्फ बाईस करोड़ तेईस लाख रुपए खर्च किए हैं। लेकिन अगर आम आदमी पार्टी सरकार खुद को साधारण जनता की प्रतिनिधि मानती और उसके भारी समर्थन का दावा करती है, तो आखिर उसे हर महीने करीब आठ करोड़ रुपए अरविंद केजरीवाल और पार्टी का महिमामंडन करने वाले विज्ञापनों पर बहाने की जरूरत क्यों महसूस हो रही है! किन वजहों से उसे दिल्ली के बजट में प्रचार के मद में करीब सवा पांच सौ करोड़ रुपए का प्रावधान करना जरूरी लगा?

गौरतलब है कि दिल्ली की पिछली कांग्रेस सरकार का विज्ञापन का बजट महज बीस से पच्चीस करोड़ रुपए होता था। इसके अलावा, ‘आप’ सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का भी प्रकारांतर से खयाल नहीं रखा, जिसमें उसने कहा था कि सरकारी विज्ञापनों में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को छोड़ कर किसी अन्य नेता की तस्वीर का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। विचित्र है कि इसे लेकर दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान केजरीवाल सरकार ने पिछले हफ्ते कहा था कि यह खर्च आम आदमी पार्टी के कोष से किया जा रहा है, जबकि अब उसने यह खर्च दिल्ली सरकार के कोष से होने की बात कही है।

सवाल है कि सामान्य जनता के पैसे को पार्टी और उसके नेता के महिमामंडन पर खर्च करने का क्या औचित्य है! क्या इसकी जरूरत इसलिए पड़ रही है कि पिछले दिनों उसके कई नेताओं पर भ्रष्टाचार और आपराधिक मामलों में लिप्त होने के आरोप लगे और इससे उसकी छवि को भारी नुकसान हुआ है? इस तर्क को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि विज्ञापन के मद में सरकार ने जो रकम तय की है, उससे स्कूल, सार्वजनिक परिवहन और गरीबों के लिए आवास की कमी पूरी करने में काफी मदद मिल सकती है।

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