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साख का सवाल

आंतरिक लोकतंत्र, पारदर्शिता और स्वच्छ प्रशासन के जिन वादों के साथ आम आदमी पार्टी सत्ता में आई थी, लगता है उन्हें उसने हाशिये पर धकेलना शुरू कर दिया है। पहले जिस तरह योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे संस्थापक सदस्यों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाने में अड़ियल रुख अपनाया गया उससे उसके लोकतांत्रिक […]

Author April 23, 2015 14:13 pm

आंतरिक लोकतंत्र, पारदर्शिता और स्वच्छ प्रशासन के जिन वादों के साथ आम आदमी पार्टी सत्ता में आई थी, लगता है उन्हें उसने हाशिये पर धकेलना शुरू कर दिया है। पहले जिस तरह योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे संस्थापक सदस्यों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाने में अड़ियल रुख अपनाया गया उससे उसके लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास पर प्रश्नचिह्न लगे, अब अरविंद केजरीवाल सरकार के कामकाज का तरीका बदलता नजर आने लगा है। दिल्ली के बुराड़ी में उर्स शिविर और फिर जलशोधन संयंत्र के उद्घाटन के मौके पर जिस तरह मीडिया और आम लोगों को मुख्यमंत्री के कार्यक्रम से दूर रखा गया, उससे यही जाहिर हुआ। यों अरविंद केजरीवाल ने सुरक्षा घेरे में चलने से इनकार कर दिया है, मगर बुराड़ी के कार्यक्रमों में पुलिस ने इसी तर्क पर लोगों को उनके पास जाने से रोक दिया कि इससे उनकी सुरक्षा को खतरा पैदा हो सकता है। बताया गया कि मुख्यमंत्री कार्यालय के एक खास अधिकारी से फोन पर मिले आदेश के चलते ऐसा किया गया।

सवाल है कि अगर मुख्यमंत्री को मीडिया और आम लोगों से दूरी बना कर रखनी है, तो इसके लिए लिखित आदेश क्यों नहीं दिया गया। अगर उन्हें सचमुच कोई खतरा महसूस हो रहा है तो सुरक्षा घेरे से गुरेज क्यों। उनका यह रवैया आम आदमी पार्टी के सिद्धांतों से मेल नहीं खाता। पहले ही उनकी जिद और एकतरफा फैसलों के चलते पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों में नाराजगी है। लोग अपने चंदे वापस मांग रहे हैं, बहुत-से प्रतिबद्ध माने जाने वाले कार्यकर्ता खुलेआम रोष जाहिर कर चुके हैं। ऐसे में पार्टी के भविष्य को लेकर संदेह पैदा हो गया है।

पार्टी से नेताओं को निकालना आसान है, उनके साथ निभाना कठिन। योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण सहित असंतुष्ट नेताओं की मांग ऐसी नहीं थी, जिसका पार्टी के भीतर बातचीत के जरिए हल नहीं निकाला जा सकता था। मगर अरविंद केजरीवाल की जिद के चलते उनकी उठाई बातों पर विचार करने की जरूरत नहीं समझी गई। यहां तक कि पार्टी के आंतरिक लोकपाल को भी बाहर कर दिया गया। तो क्या सारे सिद्धांत केवल चुनाव जीतने तक लागू थे? अगर अरविंद केजरीवाल सचमुच पार्टी में लोकतांत्रिक मूल्यों के पक्षधर होते, तो इन नेताओं को साथ लेकर चलने की कोशिश की गई होती। उन्हें पार्टी के सामने अपना पक्ष रखने का मौका तक नहीं दिया गया। अगर पार्टी के सिद्धांतों की जरा भी परवाह की गई होती तो बागी नेताओं और पार्टी के बीच की लड़ाई इस तरह सड़क पर नहीं आती। एक-दूसरे पर छींटाकशी और गाली-गलौज जैसी भाषा का इस्तेमाल होने लगा है। इससे न तो बाहर हुए नेताओं की साख बनेगी और न आम आदमी पार्टी को अपने फैसलों को सही ठहराने में कोई मदद मिलेगी।

इन विवादों और अरविंद केजरीवाल के रवैए से आम मतदाता ठगा हुआ महसूस कर रहा है, जिसने मौजूदा दूसरी पार्टियों से अलग एक नई तरह की सरकार देने के वादे पर भरोसा किया था। अरविंद केजरीवाल सरकार को बहुमत प्राप्त है, इसलिए उन्हें पांच साल तक सरकार चलाने में शायद कोई दिक्कत न पेश आए, पर इस बीच आप पार्टी की साख को जो क्षति पहुंची है, उसे वापस लाना आसान नहीं होगा। सारा असंतोष अरविंद केजरीवाल के तौर-तरीके को लेकर पैदा हुआ है, इसलिए उन्हें अपने आचरण से साबित करना होगा कि वे पार्टी के सिद्धांतों को केवल दिखावे के लिए नहीं ओढ़ते, बल्कि उन पर अमल भी करते हैं।

 

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