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संपादकीय: चुनौती भरा अभियान

टीकों को मंजूरी देने के मुद्दे पर भारत में जैसी राजनीति देखने को मिली और जिस तरह की आशंकाएं पैदा कर लोगों को डराया जा रहा है, उसे कहीं से उचित नहीं कहा जा सकता।

Author Updated: January 16, 2021 1:15 AM
CORONA VACCINATIONभारत बॉयोटेक का स्वदेशी टीका कोवैक्सीन।

देश में कोरोना महामारी से बचाव के लिए आज से शुरू होने जा रहा टीकाकरण अभियान निश्चित ही एक बड़ा और महत्त्वपूर्ण कदम है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि हम महामारी का मुकाबला कर पाने के काफी करीब पहुंच चुके हैं। महामारी की भयावहता और दुनियाभर में इसके कहर से इतना तो साफ हो गया था कि जब तक टीका नहीं आ जाता, तब तक बचाव संबंधी उपाय ही जीवन को बचाने में मददगार साबित हो सकते हैं।

पूर्णबंदी जैसे कदम भी इसीलिए उठाए गए थे, ताकि लोग घरों से न निकलें और संक्रमण का प्रसार न हो। इसलिए टीके को लेकर लंबे समय से इंतजार था। अमेरिका और यूरोप के ज्यादातर देशों की तस्वीर तो डराने वाली रही। भारत में भी संक्रमण से हुई मौतों का आंकड़ा डेढ़ लाख को पार कर चुका है। ऐसे में बिना किसी कारगर टीके के संभव ही नहीं था कि महामारी को शिकस्त दी जा सके।

भारत की आबादी को देखते हुए टीकाकरण का काम चुनौती भरा है। सबको जल्द ही एक साथ टीका लगा पाना किसी भी सूरत में संभव नहीं है। इसलिए इसके लिए प्राथमिकता तय की गई और फैसला हुआ कि अग्रिम मोर्चे पर जूझ रहे लोगों को सबसे पहले टीका दिया जाए। इनमें चिकित्सा और स्वास्थ्यकर्मियों से लेकर सुरक्षा बल तक शामिल हैं। आपात सेवाओं में लगे कर्मचारी और स्वयंसेवक भी हैं।

टीके के लिए शोध, परीक्षण से लेकर इसके निर्माण और देश में जगह-जगह पहुंचाने का काम कोई मामूली नहीं है। तैयार टीकों को सुरक्षित रूप से हर राज्य में भेजने के लिए वायुसेना की भी सेवाएं ली जा रही हैं। टीकाकरण के काम में कहीं कोई चूक न रह जाए, इसके लिए देश भर में कई बार पूर्वाभ्यास किए जा चुके हैं। अस्पतालों में कैसे इंतजाम रहेंगे, इसकी व्यवस्था भी चाक-चौबंद है। इसलिए उम्मीद है कि दुनिया का यह सबसे बड़ा अभियान महामारी से लोगों को बचा पाने में कामयाब रहेगा।

भारत के वैज्ञानिकों, डाक्टरों, स्वास्थ्यकर्मियों और इस महाभियान से जुड़े लोगों ने जिस जीवट के साथ काम किया, उसी का परिणाम है कि साल भर के भीतर ही कुछ गिने-चुने देशों के साथ हम भी टीका बनाने से लेकर उसे लगाने में सफल हो पाए हैं। इसे भी बड़ी कम बड़ी उपलब्धि नहीं माना जाना चाहिए कि भारत में बने टीकों का दुनिया के दूसरे देशों में भी परीक्षण चल रहा है और जरूरत पड़ने पर हम टीकों का निर्यात करने में भी सक्षम हैं।

देश में सीरम इंस्टीट्यूट आफ इंडिया के टीके कोविशील्ड और भारत बायोटेक के टीके कोवैक्सीन के आपात इस्तेमाल को मंजूरी दी गई है। हालांकि टीकों को लेकर कुछ विवाद भी खड़े हुए और इस कारण लोगों में भय और अविश्वास भी पैदा हुआ। लेकिन देश के चिकित्सा विशेषज्ञों और महामारी विशेषज्ञों ने टीके कारगर होने का भरोसा दिलाया है। टीकाकरण जैसे अभियानों की सफलता के लिए जरूरी है कि इन्हें लेकर लोगों के मन में कोई संदेह पैदा न किया जाए।

टीकों को मंजूरी देने के मुद्दे पर भारत में जैसी राजनीति देखने को मिली और जिस तरह की आशंकाएं पैदा कर लोगों को डराया जा रहा है, उसे कहीं से उचित नहीं कहा जा सकता। महामारी के प्रकोप को देखते हुए जितनी जल्दी टीके बने हैं, उसमें हो सकता है कि वे सौ फीसद कारगर न हों, लेकिन ऐसा मान बैठना भी सही नहीं है कि टीकों का कोई लाभ नहीं होगा। एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सिर्फ टीका ही हमें नहीं बचाएगा, बल्कि मास्क लगाने और सुरक्षित दूरी जैसे बचाव संबंधी उपाय भी उतने ही जरूरी हैं।

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