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संपादकीय: भूजल की सुध

आमतौर पर भूजल स्वच्छ होता है, लेकिन अरसे से अनियमित और अनियंत्रित जीवनशैली ने भूजल को दूषित किया है।

Author September 20, 2016 6:43 AM
जो उद्योग या किसान जेट अथवा समर्सिबल पंप लगा कर धकाधक भूजल खींच रहा है, उस पर कोई पाबंदी नहीं कि जितना लिया, उतना पानी वापस धरती को लौटाए। हालांकि राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने एक मामले में उद्योगों को ऐसे आदेश जारी किए हैं। (प्रतीकात्मक चित्र)

भूजल की विषाक्तता को लेकर चर्चा करते हुए लंबा अरसा हो गया, लेकिन इस समस्या से निपटने के लिए कोई ठोस उपाय अब तक नहीं किए गए। राज्यों की विषय सूची में होने की वजह से केंद्रीय योजनाओं के साथ कभी उनका ठीक से तालमेल नहीं हो पाया। इसका नतीजा यह रहा कि इस दिशा में कोई सुचिंतित रणनीति नहीं बन पाई। अब जब पानी सिर से ऊपर हो गया है तब कहीं जाकर केंद्र सरकार की तंद्रा टूटी है और उसने एक दीर्घजीवी योजना बना कर इससे निपटने की ठानी है। स्थिति की भयावहता का अनुमान एक ताजा रिपोर्ट से लगाया जा सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक दस राज्यों के नवासी जिलों में भूजल में आर्सेनिक, बीस राज्यों के तीन सौ सत्रह जिलों में फ्लोराइड, इक्कीस राज्यों के तीन सौ सत्तासी जिलों में नाइटेट और छब्बीस राज्यों के तीन सौ दो जिलों में लौहतत्त्व पाया गया है। ये वे तत्त्व हैं, जो पानी को जहरीला करते हैं और उसका उपयोग हर तरह से विनाशकारी हो जाता है। इन तत्त्वों का सेवन न केवल मनुष्यों के लिए बल्कि जीवों, वनस्पतियों, खेती-पाती आदि सभी के लिए खतरनाक है। देश के दो करोड़ लोग सीधे तौर पर जहरीले जल के उपयोग से प्रभावित हैं और उनमें तरह-तरह की बीमारियां पनप चुकी हैं। उनका इलाज भी बड़ी चुनौती है।

रिपोर्ट बताती है कि आमतौर पर भूजल स्वच्छ होता है, लेकिन अरसे से अनियमित और अनियंत्रित जीवनशैली ने भूजल को दूषित किया है। इसका सबसे बड़ा खमियाजा सेहत के मोर्चे पर भुगतना पड़ रहा है। भूजल का ऊपरी स्तर ज्यादातर इलाकों में इतना प्रदूषित हो चुका है कि वह पीने के लायक नहीं रह गया है। इस समस्या से निपटने के लिए राजीव गांधी मिशन पेयजल योजना बनी थी, जिसके तहत हैंडपंप इंडिया मार्क-दो पूरे देश के ग्रामीण क्षेत्रों में लगाया गया था। इसकी खासियत यह थी कि बोरिंग पचास मीटर तक होती थी, ताकि ज्यादा गहराई से शुद्ध पेयजल निकाला जा सके। लेकिन यह योजना भ्रष्टाचार और शासन की अदूरदर्शिता की भेंट चढ़ गई। भूजल का अंधाधुंध दोहन, कारखानों का नदियों में घुलता रासायनिक अपशिष्ट, जलस्रोतों में बढ़ते प्रदूषण आदि की वजह से धरती के भीतर का पानी जहरीला होता गया है। भारत में सिंचाई की साठ प्रतिशत, ग्रामीण पेयजल की पचासी प्रतिशत, शहरी पेयजल की पचास प्रतिशत जरूरत भूजल से पूरी होती है। कह सकते हैं भूजल से सीधे हमारा मुस्तकबिल जुड़ा है। पर आज हालत यह है कि भूजल खतरे में है और इसे बचाए रखना बड़ी चुनौती है। इन स्थितियों से निपटने के सरकार ने राष्ट्रीय जल विज्ञान परियोजना को आगे बढ़ाने, राष्ट्रीय भूजल सुधार कार्यक्रम और समग्र जल सुरक्षा को जोड़ने की पहल की है।

हमने हरित क्रांति, श्वेतक्रांति, नीली क्रांति, गुलाबी क्रांति आदि देख लीं। वास्तव में अब जरूरत है जल क्रांति की। सरकार का ध्यान भूजल की बर्बादी को रोकने के साथ-साथ जल संचयन के पारंपरिक तरीकों पर भी गया है। इसलिए नई कार्ययोजना में तालाबों के निर्माण, बाग-बगीचों की परवरिश, प्राकृतिक जलस्रोतों के संरक्षण आदि को भी अहमियत दी गई है। भूजल भंडार के तेजी से क्षरण और भूजल के प्रदूषण को एक बड़ी समस्या के तौर चिह्नित कर सरकार ने जो कार्ययोजना बनाई है उसे देर से उठाया गया सही कदम कह सकते हैं। जरूरत है इसे अंजाम तक पहुंचाने की।

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