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विरोधाभास का घेरा

सन टीवी नेटवर्क को सुरक्षा संबंधी मंजूरी न दिए जाने के केंद्रीय गृह मंत्रालय के फैसले पर पहले से अंगुलिया उठ रही थीं। अब खुद केंद्र सरकार के महाधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने मंत्रालय के रुख को दोषपूर्ण बताया है। सन टीवी नेटवर्क को सुरक्षा संबंधी मंजूरी देने से गृह मंत्रालय ने इस बिना पर इनकार […]

Author June 22, 2015 5:53 PM

सन टीवी नेटवर्क को सुरक्षा संबंधी मंजूरी न दिए जाने के केंद्रीय गृह मंत्रालय के फैसले पर पहले से अंगुलिया उठ रही थीं। अब खुद केंद्र सरकार के महाधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने मंत्रालय के रुख को दोषपूर्ण बताया है। सन टीवी नेटवर्क को सुरक्षा संबंधी मंजूरी देने से गृह मंत्रालय ने इस बिना पर इनकार कर दिया था कि उससे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा है। यह दलील गले उतरने वाली नहीं थी। पर मंत्रालय अपने निर्णय को उचित ठहराते हुए यह कहता रहा है कि सन टीवी नेटवर्क के मालिकों के खिलाफ अनियमितता के मामले चल रहे हैं और देश की आर्थिक सुरक्षा को खतरा हो तो राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरे को खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन क्या यही पैमाना सरकार ने अनियमितता के दूसरे मामलों में लागू किया है, यानी उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जोड़ा है?

गौरतलब है कि दक्षिण की चार भाषाओं में प्रसारण करने वाले सन टीवी नेटवर्क के मालिक कलानिधि मारन हैं। वे और उनके भाई पूर्व केंद्रीय मंत्री दयानिधि मारन भ्रष्टाचार और काले धन को सफेद करने आदिकई मामलों का सामना कर रहे हैं। एअरसेल-मैक्सिस सौदे को लेकर मारन बंधु सीबीआइ जांच के घेरे में हैं। निश्चय ही ये गंभीर आरोप हैं और इनकी निष्पक्ष जांच तेजी से होनी चाहिए। लेकिन जब तक ये मामले अदालत में लंबित हैं, सरकार ऐसा व्यवहार कैसे कर सकती है मानो वे दोषी ठहरा दिए गए हों। फिर, भ्रष्टाचार के मामलों को राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ गड्डमड्ड करने की क्या तुक है। कई और राजनीतिकों के पास मीडिया संस्थान हैं जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप भी हैं। मसलन, वाइएसआर कांग्रेस के नेता जगन मोहन रेड्डी। क्या उनके इस कारोबार को केंद्र ने कभी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा करार दिया?

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इससे पहले सन टीवी नेटवर्क के रेडियो चैनलों को भी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरनाक बता कर सुरक्षा संबंधी मंजूरी देने से गृह मंत्रालय ने मना कर दिया था। इस पर कंपनी अदालत की शरण में गई और उसे स्थगन आदेश मिल गया। सन टीवी नेटवर्क की बाबत गृह मंत्रालय के रुख के औचित्य को लेकर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भी आश्वस्त नहीं रहा होगा। शायद इसीलिए उसे महाधिवक्ता की राय लेने की जरूरत महसूस हुई होगी। यों महाधिवक्ता की राय मानना सरकार के लिए बाध्यता नहीं है, मगर आमतौर पर सरकार उसे स्वीकार करती है। देखना है कि अब विधि मंत्रालय इस मामले में क्या कहता है और सरकार आखिरकार किस नतीजे पर पहुंचती है।

पर महाधिवक्ता की राय के बाद यह सवाल जरूर एक बार फिर से दरपेश हुआ है कि इस मामले में राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरे का भूत क्यों खड़ा किया गया? विचित्र है कि कई संगीन आर्थिक अपराधों के एक भगोड़े आरोपी, जिसकी प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग को तलाश हो, की मदद करने के तथ्य सामने आ जाने के बाद भी भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व वसुंधरा राजे को मुख्यमंत्री बनाए रखना चाहता है। पार्टी की दलील है कि ललित मोदी प्रकरण में दस्तावेजों का सत्यापन नहीं हुआ है। फिर सन टीवी नेटवर्क के साथ ऐसा बर्ताव क्यों, जिसके मालिकों के खिलाफ जांच अभी चल रही है। मारन बंधु द्रमुक से और करुणानिधि के परिवार से ताल्लुक रखते हैं। महाधिवक्ता की राय सामने आने के बाद यह सवाल उठे बिना नहीं रहेगा कि गृह मंत्रालय के रुख के पीछे कहीं सियासी वजह तो नहीं है!

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