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संपादकीय: भेदभाव का पाठ

यह समझना मुश्किल है कि जिस शिक्षक को इतने सारे बच्चों को शिक्षित करने और बाकायदा एक स्कूल को संचालित करने लायक समझा गया, उसकी समझदारी की सीमा और पूर्वाग्रहों का आलम यह है! एक व्यक्ति के पूर्वाग्रहों को उसका निजी मामला मान लिया जा सकता है।

Author October 12, 2018 2:39 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है।

राजधानी दिल्ली के एक स्कूल में बच्चों को धर्म के आधार अलग-अलग बिठाने की जो हरकत सामने आई है, आज के दौर में एकबारगी उस पर विश्वास करना मुश्किल हो सकता है। पर हैरानी की बात है कि यह कदम खुद उस स्कूल के प्रभारी शिक्षक ने इस दलील के साथ उठाया था कि इससे बच्चों के बीच ‘शांति और अनुशासन’ का माहौल बनाए रखा जा सकेगा। इससे ज्यादा अफसोसनाक बात और क्या हो सकती है कि एक शिक्षक ऐसा तर्क पेश करता है। जबकि दुनिया भर में धर्म और नस्ल के आधार पर समाज में पैदा होने वाले तकलीफदेह विभाजन को खत्म करने की उम्मीद बच्चों से ही की जाती है, क्योंकि कोई भी दायरा बच्चों की मासूमियत को नहीं बांध पाता है। हालांकि इसी साल जुलाई में स्कूल का प्रभारी बनाए जाने के बाद जब इस शिक्षक ने कई कक्षाओं में हिंदू और मुसलिम बच्चों को अलग-अलग वर्गों में बैठने की व्यवस्था लागू की, तभी वहां के दूसरे कुछ शिक्षकों ने आपत्ति जताई थी। मगर सवाल यह भी है कि पिछले करीब दो-ढाई महीने से स्कूल में यह व्यवस्था चल रही थी तो किसी अधिकारी को इस बारे में पता क्यों नहीं चला? स्कूलों में समय-समय पर निरीक्षण के लिए जाने वाले अधिकारियों के संज्ञान में यह बात कैसे और क्यों नहीं आई?

यह समझना मुश्किल है कि जिस शिक्षक को इतने सारे बच्चों को शिक्षित करने और बाकायदा एक स्कूल को संचालित करने लायक समझा गया, उसकी समझदारी की सीमा और पूर्वाग्रहों का आलम यह है! एक व्यक्ति के पूर्वाग्रहों को उसका निजी मामला मान लिया जा सकता है। मगर इस शिक्षक ने अपनी मानसिकता को स्कूल के मासूम बच्चों पर थोपने की कोशिश की। अंदाजा लगाया जा सकता है कि अब तक शिक्षक के रूप में इस व्यक्ति ने बच्चों को किस तरह की शिक्षा दी होगी। भारत के संविधान की मूल भावना से लेकर लोकतांत्रिक परंपराओं और शिक्षक-प्रशिक्षण की तमाम नियमावलियां एक शिक्षक की यह जिम्मेदारी तय करती हैं कि वह बच्चों को स्कूली पाठ्यक्रम पूरा कराने के साथ-साथ उनके बीच समानता, सौहार्द और मेलजोल के भाव पैदा करे। पर इन सबको ताक पर रख कर अगर किसी शिक्षक ने स्कूल के बच्चों को इस तरह विभाजित करने की कोशिश की तो इसे महज संयोग मान कर टालना शायद ठीक नहीं होगा।

यह किसी से छिपा नहीं है कि पिछले कुछ सालों से देश में राजनीतिक गतिविधियों और नेताओं की बयानबाजियों ने एक ऐसा माहौल बना दिया है कि लोग किसी भी सामाजिक-राजनीतिक मसले को मानवीय लिहाज से देखने के बजाय उस पर भिन्न धर्मों या समुदायों के नजरिए से बात करने लगते हैं। मगर इन सबके बीच इंसानियत के मूल्यों में विश्वास रखने वाले लोग भविष्य के बेहतर और सौहार्दपूर्ण समाज के लिए बच्चों को ही उम्मीद की नजर देखते रहे हैं। अब अगर बच्चों के कोमल मन-मस्तिष्क में ही धर्म या जाति के नाम पर अलगाव का भाव पैदा कर दिया जाएगा तो आगे चल कर वे देश के कैसे नागरिक बनेंगे? उनके बीच पैदा हुई आपसी दूरी भविष्य में कोई राजनीतिक शक्ल नहीं ले लेगी, इसकी गारंटी कौन दे सकता है? संबंधित स्कूल प्रभारी को निलंबित कर दिया गया है। जरूरत इस बात की है कि इस मसले पर तर्कसंगत कार्रवाई हो, ताकि ऐसा दूसरा उदाहरण कभी सामने न आए। यही देश और इंसानियत के हित में होगा।

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