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संपादकीय: हादसों का सिलसिला

अक्सर दुर्घटनाओं के बाद ऐसे तथ्य सामने आते हैं कि इमारत के प्रबंधन ने अग्निशमन विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र हासिल नहीं किया था या उसके बाद घोर लापरवाही बरती गई थी। सवाल है कि इस स्थिति पर निगरानी रखने, समय-समय पर जांच करने और कोताही बरतने पर कार्रवाई करने की ड्यूटी किसकी होती है?

Author August 24, 2018 2:54 AM
दादर स्थित सत्रह मंजिला इमारत की बारहवीं मंजिल पर आग की घटना।

मुंबई में एक बहुमंजिला इमारत में आग लगने की घटना से एक बार फिर यही जाहिर हुआ है कि न तो लोग खुद अपनी सुरक्षा के प्रति सजग होते हैं, न संबंधित सरकारी महकमों को अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाना जरूरी लगता है। वहां दादर स्थित सत्रह मंजिला इमारत की बारहवीं मंजिल पर सुबह उस वक्त आग लगी, जब उसमें रहने वाले ज्यादातर लोग अपने कामकाज की जगहों पर जाने की तैयारी कर रहे थे। जाहिर है, यह एक बड़ी वजह रही कि इमारत में बहुत सारे लोगों ने जान बचाने की कोशिश अपने स्तर पर की। बाद में अग्निशमन दस्ते ने भी काफी लोगों को इमारत से सुरक्षित निकालने में कामयाबी हासिल की। इसके बावजूद दम घुटने से चार लोगों की मौत हो गई, जबकि इक्कीस अन्य घायल हो गए। आग लगने का कारण फिलहाल शॉर्ट सर्किट बताया गया है। यह समझना मुश्किल है कि शॉर्ट सर्किट की वजह से आग लगने की ऐसी घटनाएं अक्सर होने के बावजूद रिहाइशी इमारतों में सुरक्षित बिजली आपूर्ति की व्यवस्था पर ध्यान क्यों नहीं दिया जाता है! जबकि बिजली के तार व्यवस्थित तरीके से लगाने में बरती गई बेहद मामूली लापरवाही भी समूची इमारत को जोखिम में डाल सकती है।

बीएमसी यानी बृहन्मुंबई नगर निगम के मुताबिक इस इमारत के पास अनिवार्य कब्जा प्रमाण-पत्र न होने के बावजूद इसमें अट्ठावन फ्लैट मालिकों का कब्जा था। इन सभी निवासियों के साथ-साथ इसके बिल्डर को दो साल पहले ही सात दिनों के अंदर इमारत को खाली करने का नोटिस जारी किया गया था। इसे अदालत में चुनौती मिलने की वजह से यथास्थिति बनी रही। लेकिन अब इस हादसे और इसमें हुए जानमाल के नुकसान के लिए किसे जिम्मेदार माना जाएगा! इस दुर्घटना के बाद अग्निशमन विभाग ने फिर से इमारत को असुरक्षित घोषित कर दिया और बिजली-पानी की आपूर्ति काटने की सिफारिश की। सवाल है कि संबंधित सरकारी महकमों की नींद तभी क्यों खुलती है, जब कोई बड़ा हादसा हो जाता है! कोई इमारत रहने के लिहाज से पूरी तरह सुरक्षित है, यह सुनिश्चित करना बिल्डर के साथ-साथ संबंधित सरकारी विभाग की जिम्मेदारी है। मगर यह किसी से छिपा नहीं है कि खतरनाक हालत में मौजूद मकानों में भी लोग अगर रह होते हैं, तो उसके पीछे सरकारी अधिकारियों और बिल्डरों या उस इमारत के प्रबंधन की मिलीभगत एक बड़ा कारण होता है।

अक्सर दुर्घटनाओं के बाद ऐसे तथ्य सामने आते हैं कि इमारत के प्रबंधन ने अग्निशमन विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र हासिल नहीं किया था या उसके बाद घोर लापरवाही बरती गई थी। सवाल है कि इस स्थिति पर निगरानी रखने, समय-समय पर जांच करने और कोताही बरतने पर कार्रवाई करने की ड्यूटी किसकी होती है? मुंबई अग्नि प्रतिबंधक और जीवरक्षक उपाय योजना अधिनियम, 2006 के तहत नियमों पर अमल कराने की जिम्मेदारी मुंबई अग्निशमन विभाग की है। लेकिन करीब दो महीने पहले सूचनाधिकार कानून के जरिए मिली एक जानकारी के मुताबिक बीते छह सालों के दौरान मुंबई में आग लगने की उनतीस हजार से ज्यादा घटनाएं सामने आर्इं, जिनमें मरने वालों की तादाद तीन सौ दर्ज थी। सवाल है कि जिस महानगर के बारे में माना जाता है कि वह कानून-व्यवस्था को लागू करने के मामले में सबसे ज्यादा पाबंद है, वहां इस तरह की व्यापक लापरवाही के मामले कैसे आम हैं! क्या यही मुख्य वजह नहीं है कि इमारतों में आग लगने और उसमें लोगों के मरने का सिलसिला जारी है!

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