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संपादकीय : तेल की तकलीफ

नीति आयोग के इस तर्क से साफ है कि पेट्रोल-डीजल की महंगाई का एक पहलू जहां अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम में हुआ इजाफा है, वहीं दूसरा पहलू यह है कि भारत में पेट्रोलियम पदार्थों पर करों का बहुत बोझ है। शायद ही दुनिया में कहीं और पेट्रोल-डीजल पर इतना कर लगाया जाता हो।

Author May 26, 2018 3:35 AM
बढ़े पेट्रोल के दाम ।

पेट्रोल और डीजल के दामों ने उपभोक्ताओं के होश उड़ा दिए हैं। कई शहरों में पेट्रोल अस्सी रुपए के ऊपर बिक रहा है। लेकिन सरकार ने अभी तक ऐसा कोई कदम उठाने की जरूरत नहीं समझी जिससे लोगों को राहत मिले। सिर्फ आश्वासन सुनने को मिल रहे हैं कि जल्द ही राहत मिलेगी, कुछ कटौती होगी, तेल के दाम तय करने या कम करने के लिए स्थायी और दीर्घकालिक फार्मूला निकाला जाएगा। जबकि पिछले एक पखवाड़े से तेल के दाम लगातार बढ़ते रहे हैं। ऐसे में नीति आयोग ने जो सुझाव दिया है उस पर गौर करने की जरूरत है। नीति आयोग का कहना है कि अगर केंद्र और राज्य सरकारें अपना खजाना भरने का लालच छोड़ दें तो पेट्रोल-डीजल के दाम नीचे लाए जा सकते हैं। पेट्रोलियम पदार्थों पर उत्पाद शुल्क जैसे कर लगाने का जो अधिकार राज्यों और केंद्र के पास है, उसमें उन्हें नरमी दिखानी चाहिए; इन करों में दस से पंद्रह फीसद की कटौती होनी चाहिए; केंद्र से भी ज्यादा राज्य इसमें कारगर भूमिका निभा सकते हैं।

नीति आयोग के इस तर्क से साफ है कि पेट्रोल-डीजल की महंगाई का एक पहलू जहां अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम में हुआ इजाफा है, वहीं दूसरा पहलू यह है कि भारत में पेट्रोलियम पदार्थों पर करों का बहुत बोझ है। शायद ही दुनिया में कहीं और पेट्रोल-डीजल पर इतना कर लगाया जाता हो। जाहिर है, एक सीमा के बाद पेट्रोल-डीजल महंगा-सस्ता करना सरकारों के अपने हाथ में है। सरकारें चाहें तो जनता को राहत दें, नहीं तो उसकी जेब से पैसा खींचती रहें। वर्ष 2014 में केंद्र सरकार को तेल पर साठ हजार करोड़ रुपए का कर-राजस्व मिला था, जो बढ़ कर 2017 में दो लाख सत्तर हजार करोड़ रुपए तक पहुंच गया, जबकि राज्यों की कमाई का आंकड़ा एक लाख करोड़ से बढ़ कर एक लाख नब्बे हजार करोड़ पर जा पहुंचा। ऐसे में नीति आयोग का तर्क काफी दमदार है। लेकिन क्या नीति आयोग के सुझाव के अनुरूप केंद्र सरकार और राज्य सरकारें कोई कदम उठाएंगी? केंद्र सरकार ने पहले ही इस बारे में अपने तर्क देकर किनारा कर लिया है। उसका कहना है कि पेट्रोलियम राजस्व का इस्तेमाल कल्याणकारी योजनाओं और राजमार्ग बनाने, गांवों में बिजली पहुंचाने, अस्पताल और शिक्षा क्षेत्र के विकास कार्यों में होता है।

इसलिए सरकार की ओर से यह तजवीज सुझाई जा रही है कि सरकारी और निजी तेल कंपनियां ही कीमतों में कमी लाने का उपाय करें। अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम जैसे ही सत्तर डॉलर प्रति बैरल के ऊपर जाएंगे, इन कंपनियों पर सेस यानी उप-कर लगेगा। सत्तर डॉलर प्रति बैरल से ऊपर तेल कंपनियों को जितना भी मुनाफा होगा उस पर सरकार कर वसूलेगी और यह पैसा तेल का खुदरा कारोबार करने वाली कंपनियों को देगी। लेकिन जनता को इससे कितना फायदा होगा, यह वक्त बताएगा। पिछले साल जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल चौवन डॉलर प्रति बैरल तक नीचे आ गया था, तब भी भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें नई ऊंचाइयां छू रही थीं। उपभोक्ताओं को आंकड़ों और फार्मूलों में उलझाने के बजाय सरकार को इसका व्यावहारिक और प्रभावी समाधान निकालना चाहिए।

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