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संपादकीय: कुत्तों का आतंक

बच्चों ने स्कूल जाना बंद कर दिया है। लोग अकेले घर से निकलने में डरने लगे हैं। भेड़-बकरियों पर भी इन कुत्तों के हमले आम हैं। प्रदेश के ही आजमगढ़ जिले में कुछ महीने पहले कुत्ते आठ महीने की बच्ची को खा गए थे।

Author May 11, 2018 04:35 am
(प्रतीकात्‍मक फोटो)

उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में आदमखोर कुत्तों का आतंक रोंगटे खड़े कर देने वाला है। इस महीने की एक तारीख को जिले के खैरागढ़ गांव में आदमखोर कुत्तों ने तीन बच्चों को मार डाला। एक ही दिन अलग-अलग घटनाओं में तीन बच्चों की जान चली गई। मारे गए सभी बच्चे बारह साल से कम के थे। ये बच्चे एक बगीचे में आम लेने गए थे, तभी कुत्तों ने इन्हें घेर लिया और मार डाला। इस इलाके में कुत्तों का आतंक इस कदर बढ़ गया है कि पिछले चार महीनों के दौरान तेरह बच्चों की जान चली गई। कुत्तों के हमलों में कई घायल हो चुके हैं। दहला देने वाली इन घटनाओं से जिले के ज्यादातर गांवों में दहशत है। बच्चों ने स्कूल जाना बंद कर दिया है। लोग अकेले घर से निकलने में डरने लगे हैं। भेड़-बकरियों पर भी इन कुत्तों के हमले आम हैं। प्रदेश के ही आजमगढ़ जिले में कुछ महीने पहले कुत्ते आठ महीने की बच्ची को खा गए थे। कुछ साल पहले कुत्तों के एक झुंड ने कानपुर के चिड़ियाघर में एक बाड़े में घुस कर इकतीस काले हिरणों को मार डाला था। ज्यादातर राज्यों से आए दिन ऐसी खबरें आती हैं। कुत्तों के आतंक से केरल किस कदर परेशान है, इसका अनुमान इसी से लगा सकते हैं कि वहां एक कॉलेज के पूर्व छात्र संगठन ने आवारा कुत्तों का खात्मा करने वाले पंचायत और निकाय प्रमुखों को सोने का सिक्का उपहार में देने का एलान किया था।

सीतापुर की इन घटनाओं के बाद उत्तर प्रदेश सरकार की नींद खुली और हालात की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय प्रशासन हरकत में आया। सीतापुर नगरपालिका और लखनऊ नगर निगम की टीम आवारा कुत्तों को पकड़ने पहुंची। करीब चालीस कुत्तों की नसबंदी किए जाने की भी खबर है। पर आदमखोर कुत्तों का पता नहीं लगा। अधिकारियों ने आशंका जताई है कि आदमखोर कुत्ते नहीं, बल्कि भेड़िए या अन्य खूंखार जानवर हो सकते हैं जो गर्दन पर हमला करते हैं। कहा तो यह भी जा रहा है कि खैराबाद में एक बूचड़खाना था, जहां से इन कुत्तों को खाना मिल जाता था। लेकिन बूचड़खाना बंद होने से कुत्ते आदमखोर हो गए। सवाल उठता है कि स्थानीय प्रशासन की क्या कोई जिम्मेदारी नहीं बनती, जो लोगों को इस तरह के गंभीर संकट से निजात दिलाए? इस तरह की घटनाओं को लेकर स्थानीय प्रशासन के अधिकारी जिस तरह की दलीलें दे रहे हैं वे मामले से पल्ला झाड़ने की कोशिशों से ज्यादा कुछ और नहीं लगतीं।

आवारा कुत्तों से निजात दिलाने की जिम्मेदारी शहरों के स्थानीय निकाय प्रशासन की होती है। लेकिन जिस तरह से आए दिन ऐसी घटनाएं सामने आती हैं, उससे लगता है कि किसी के कान पर जूं नहीं रेंगती। समय-समय पर अदालतों ने भी इस तरह की घटनाओं का संज्ञान लेते हुए आवारा कुत्तों को पकड़ने के बारे में दिशा-निर्देश भी जारी किए, लेकिन लगता है सब बेअसर ही साबित हुए। आवारा कुत्तों के मसले पर दिल्ली हाईकोर्ट को सौंपी गई रिपोर्ट में बाकायदा बताया गया कि दिल्ली में बीमार और आवारा कुत्तों को पकड़ने, उनका इलाज करने व रखने के लिए नगर निगम के पास कोई व्यवस्था नहीं है। लगता है सारे नगर निगम इसी तरह लाचार बने हुए हैं।

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