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बाजार में हुनर

अब त्योहार लोगों के हाथ में मौजूद मोबाइल स्क्रीन में सिमटते जा रहे हैं। कुछ साल पहले तक त्योहारों पर अंचल में एक-दूसरे के घर जाकर आशीर्वाद लेने जाने की परंपरा थी।

Author March 5, 2019 3:55 AM
झालरों, गुलदस्तों आदि ने गेंदे के फूलों की माला को बाजार से बाहर का रास्ता दिखा दिया।

तनिष्का वैद्य

खरीदारी करने इस बार कस्बे के बाजार में जाना पड़ा। आमतौर पर महानगरों में मॉल कही जाने वाली बहुमंजिला इमारतों में सजे बाजार से सामान खरीदने के मुकाबले कस्बे की खरीदारी बिल्कुल अलग होती है। यहां सड़कों के किनारे छोटी-छोटी अस्थायी दुकानें सजी होती हैं। इनमें ज्यादातर लोक कलाओं और लोगों के हुनर से तैयार चीजें मिलती हैं। जैसे गांवों में हाट या मेले लगते हैं। उत्सव या त्योहारों के समय कस्बे में सड़क के दोनों तरफ दूर तक ऐसी रंग-बिरंगी दुकानें हुआ करती थीं। होली, दिवाली, राखी, नवरात्र आदि अवसरों पर यही दृश्य दिखाई पड़ते थे।

लेकिन बीते चार-पांच महीनों के दौरान लोगों की व्यापक भागीदारी वाले त्योहारों के मौके पर बाजार उस रूप में नहीं था। यहां भी तैयार कपड़े या फिर रेडीमेड ने अपने पांव पसार लिए थे। इस बाजार में पीढ़ियों पुरानी हुनर से तैयार होने वाली वस्तुएं कहीं नजर नहीं आ रही थीं। लोक कलाएं तो खैर पहले से ही कम होती जा रही हैं। त्योहार धीरे-धीरे अपने लोक कला के उत्सवी रंगों को पीछे छोड़ते जा रहे हैं। त्योहारों में आते नित नए बदलावों से बाजार को तो फायदा मिल रहा है, लेकिन अंचल की लोककला का कौशल और हुनर खत्म हो रहा है। लगातार कई परंपराएं और विधाएं लुप्त हो रही हैं। यही हाल शादी-ब्याह के मौके का भी है।

होली जैसे त्योहारों के मौके पर घरों में मां-बहनों के हाथों से बने पकवानों का जो स्वाद मुंह में कई महीनों तक घुला रहता था, वह अब रेडीमेड मिठाइयों में कहां! कई बार तो रेडीमेड मिठाइयां और मावा बीमारियों का कारण बनता है। हर बार त्योहारों के समय हजारों क्विंटल नकली मावा और उससे बनी मिठाइयां पकड़ी जाती हैं। इसी तरह, पहले घूमते चाक के साथ जबर्दस्त तालमेल और साधना से लैस हाथों के साथ बनते मिट्टी के घड़े अब कम दिखते हैं और दीये अब सुगंधित मोमबत्तियों में बदल चुके हैं। एक समय था जब दीयों के बिना दीवाली सोची ही नहीं जा सकती थी, लेकिन अब बिजली की झालरों ने जैसे दीयों की रोशनी को फीका कर दिया है।

प्लास्टिक की माला, झालरों, गुलदस्तों आदि ने गेंदे के फूलों की माला को बाजार से बाहर का रास्ता दिखा दिया। दस साल पहले तक तो लोग घर में विवाह या कोई अन्य समारोह या फिर त्योहार के मौके पर खुद गेंदे के फूलों से तोरण, मालाएं और झालर बना कर अपने घरों को सजाते थे। अब फूलों की दुकानों पर भी ज्यादा चहल-पहल नहीं दिखाई देती है। यहां तक कि घरों के दरवाजों पर भी हाथों से बने फूलों के तोरण को रेडीमेड कपड़े पर मोतियों और प्लास्टिक के तोरण से बदल दिया गया है। मिट्टी के दीयों की बात हो या फूलों की या अन्य संसाधनों की। इस तरह हम प्रकृति से भी सीधे तौर पर जुड़े रहते थे। स्थानीय संसाधनों का बेहतर उपयोग हो पाता था और कुछ खास हुनर वाले लोगों की मदद भी होती थी।

तीज-त्योहारों और उत्सवों के समय ग्रामीण अंचल में कभी समृद्ध रही मांडणों की परंपरा भी अब दम तोड़ने लगी है। बीती दिवाली पर मैंने गौर किया कि गांवों की दीवारों पर न मांडणें मिले, न फर्श पर चौक। कहीं दिखाई दिए भी तो बहुत कम और वे भी परंपरागत मांडणों से अलग। देश के हर अंचल में मांडणे की अपनी खास शैली और शिल्प होता था। इनमें सिर्फ सुंदरता नहीं, हुनर का कौशल भी झलकता था। पहले दिवाली पर नानी-दादी सफेद खड़िया, लाल-गेरू-गुलाबी या हरे-नीले रंगों से घर के फर्श और दीवारों पर परंपरागत मांडणें बनाया करती थीं। बाजार में मिल रहे रेडीमेड चिपकाने वाले मांडणें ही अब हर घर के फर्श की शोभा बन चुके हैं।

दूसरा पहलू यह भी है कि अब त्योहार लोगों के हाथ में मौजूद मोबाइल स्क्रीन में सिमटते जा रहे हैं। कुछ साल पहले तक त्योहारों पर अंचल में एक-दूसरे के घर जाकर आशीर्वाद लेने जाने की परंपरा थी। इससे व्यक्ति अपने समाज और आसपास रहने वालों से जुड़ा रहता था। एक-दूसरे के सुख-दुख साझा होते थे। सबके साथ मिल कर मनाई जाने वाली खुशी अब पुराना किस्सा बन चुकी है। बीते सालों की तुलना में बाजार बहुत बढ़ गया, लेकिन स्थानीय हुनरमंद लोग और देसी संसाधन ‘बेकाम’ हो गए हैं। इससे कई लोग बेरोजगार हुए और गरीबी का ग्राफ बढ़ा। उसी अनुपात में बहुराष्ट्रीय और नामी कंपनियों का मुनाफा बढ़ गया है। बढ़ती व्यस्तता में रेडीमेड बाजार जरूर पनप रहा है, लेकिन लोगों के भीतर त्योहार का उत्साह मरता जा रहा है। पहले लोग मन की उमंगों के साथ खुशियां मनाते थे, लेकिन अब त्योहार भी औपचारिक बनते जा रहे हैं। अब बिजली के जगमग उजाले और पटाखों की गूंज में मन का सुकून और वास्तविक खुशी कहीं खो चुकी है।

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