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संकट के सामने

नासा यानी अमेरिका की अंतरिक्ष अनुसंधान एजेंसी और मौसम विज्ञान से संबंधित अमेरिका के राष्ट्रीय संस्थान ने बताया है कि 2015 सबसे गर्म साल रहा।

Author Published on: January 22, 2016 3:02 AM

नासा यानी अमेरिका की अंतरिक्ष अनुसंधान एजेंसी और मौसम विज्ञान से संबंधित अमेरिका के राष्ट्रीय संस्थान ने बताया है कि 2015 सबसे गर्म साल रहा। वर्ष 1880 से भूमंडल के तापमान का रिकार्ड रखा जा रहा है। यानी यह एक सौ छत्तीस सालों का रिकार्ड है। पर उससे भी अधिक हो सकता है, क्योंकि जिन वर्षों के बारे में पता नहीं, कैसे मान लें कि वे ज्यादा गर्म रहे होंगे। और भी चिंताजनक यह है कि पिछला साल कोई अपवाद की तरह नहीं रहा, बल्कि यह एक रुझान को दिखाता है। 2015 से पहले 2014 सबसे गर्म वर्ष था।

पिछले साल के सबसे गर्म होने का एक प्रमुख कारण अलनीनो को माना जाता है। लेकिन सारा दोष अलनीनो पर मढ़ कर छुटकारा नहीं पाया जा सकता। यह गौरतलब है कि सबसे गर्म सोलह वर्षों में पंद्रह वर्ष इक्कीसवीं सदी के खाते में आए हैं। जाहिर है, इस सदी में भूमंडल का रिकार्ड तापमान संयोग या आकस्मिक मामला नहीं, बल्कि एक परिघटना है। वैज्ञानिकों ने बताया है कि अलनीनो के साथ-साथ ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के कारण भी 2015 सबसे गर्म वर्ष साबित हुआ।

जिस तरह पिछले साल ने उससे पिछले साल का रिकार्ड तोड़ा, क्या वैसा ही इस साल भी हो सकता है? वैज्ञानिकों का कहना है कि इस अंदेशे को नकारा नहीं जा सकता। साफ है कि दुनिया एक भयावह सिलसिले की चपेट में आ गई है। ग्लोबल वार्मिंग का एक तीखा असर अभी-अभी देश के बहुत सारे हिस्सों में लोगों ने महसूस किया है। दिसंबर में जहां कड़ाके की ठंड हुआ करती थी, लोगों को लग रहा था जैसे यह मार्च या अप्रैल का महीना हो। पर इससे भी बड़ी तकलीफें दूसरी हैं, जो असल में आपदा का रूप ले सकती हैं।

ग्लोबल वार्मिंग की वजह से मौसम में तीव्र उतार-चढ़ाव आ रहे हैं। तूफानों की बारंबारता को इसी का परिणाम माना जा रहा है। हमारे देश ने भी हाल के बरसों में उत्तराखंड और कश्मीर की बाढ़, आंध्र में आए चक्रवात, अनेक राज्यों में सूखे, और फिर चेन्नई की बाढ़ के रूप में इसके कई भयावह मंजर देखे हैं। मौसम में तीव्र उतार-चढ़ाव ने कहीं बाढ़ तो कहीं सूखे के हालात पैदा किए हैं, फसल-चक्र और ऋतुचक्र को लगभग हर जगह प्रभावित किया है। इसके चलते खाद्य संकट का अंदेशा, प्राकृतिक संसाधनों के लिए टकराव और विस्थापन का खतरा भी बढ़ा है।

माना जाता है कि हाल में सीरियाई लोगों के विस्थापन के पीछे गृहयुद्ध के साथ-साथ सूखा भी एक प्रमुख कारण था। बहरहाल, सवाल यह है कि क्या हम ग्लोबल वार्मिंग से निपटने को तैयार हैं? सौर ऊर्जा के लिए बढ़े हुए आबंटन और परिवहन-प्रदूषण पर लगाम लगाने की कोशिशों के रूप में तैयारी के कुछ लक्षण दिखते हैं। पर बहुत सारे मोर्चों पर बहुत कुछ किया जाना बाकी है। प्राकृतिक संसाधनों का संकट बढ़ सकता है, पर हमारी हालत यह है कि हम अपनी उपलब्ध जल संपदा को संपदा नहीं रहने दे रहे हैं। भारत की तमाम नदियां प्रदूषित हैं। बहुत सारी नदियों में प्रदूषण का स्तर बहुत खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है। गंगा की सफाई के लिए सरकारों को अदालतों की फटकार सुननी पड़ रही है। यमुना की हालत यह है कि इसमें अमोनिया की मात्रा इस हद तक पहुंच गई है कि दिल्ली के तीस फीसद इलाकों में जलापूर्ति रोक देनी पड़ी। क्या इसी तरह हम ग्लोबल वार्मिंग का सामना करेंगे!

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