ताज़ा खबर
 

आरक्षण की आग

हमारे देश की राजनीति में आरक्षण एक ऐसा मुद्दा है जो थोड़ा-बहुत हर वक्त सुलगता रहता है और जब-तब लपटों की भी शक्ल अख्तियार कर लेता है।

Author February 2, 2016 3:14 AM

हमारे देश की राजनीति में आरक्षण एक ऐसा मुद्दा है जो थोड़ा-बहुत हर वक्त सुलगता रहता है और जब-तब लपटों की भी शक्ल अख्तियार कर लेता है। पिछले साल गुजरात में पटेल समुदाय के लिए आरक्षण की मांग ने विस्फोटक रूप ले लिया था। अब आंध्र प्रदेश की बारी है, जहां कापु समुदाय आरक्षण की मांग को लेकर उबल पड़ा है। वे चाहते हैं कि उन्हें पिछड़े वर्ग के तहत आरक्षण दिया जाए। इस मांग को लेकर शुरू हुआ उनका आंदोलन रविवार को हिंसक हो गया।

लिहाजा, इस आंदोलन को लेकर दो सवाल उठते हैं। एक यह कि क्या अपनी मांग उठाने का यह तरीका उचित है? दूसरे, क्या पिछड़े वर्ग के तहत आरक्षण की कापु समुदाय की मांग जायज है, और क्या इसे फौरन मान लिया जाना चाहिए? इसमें दो राय नहीं कि मांग कोई भी हो, आंदोलन और विरोध-प्रदर्शन का तरीका शांतिपूर्ण होना चाहिए। पर रविवार को आंध्र में जो हुआ वह एक खौफनाक मंजर था। आरक्षण की मांग को लेकर पूर्वी गोदावरी जिले में सड़कों पर उतरी भीड़ ने रत्नाचल एक्सप्रेस पर खूब पत्थर फेंके, चार बोगियों में आग दी। मुसाफिर जान हथेली पर लेकर भागे। देखते-देखते पूरी ट्रेन आग की चपेट में आ गई।

भीड़ ने एक पुलिस थाने और रेलवे के एक दफ्तर पर भी धावा बोल दिया। भीड़ के हमलों के चलते कुछ पुलिस अधिकारी और कई रेल कर्मचारी भी घायल हो गए। दो पुलिसकर्मियों की हालत गंभीर है। इस सब के लिए पक्ष और विपक्ष, दोनों तरफ के राजनीतिक जिम्मेवार हैं। जहां मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने कापु समुदाय में ठगे जाने का अहसास जगाया, वहीं विपक्ष कापुओं की नाराजगी को भुनाने में किसी भी हद तक जाने को आमादा दिखता है। नायडू ने वादा किया था कि अगर उन्हें सत्ता में आने का मौका मिला तो छह महीने के भीतर कापु समुदाय को पिछड़े वर्ग के आरक्षण का लाभ दिया जाएगा। इस वादे के फलस्वरूप तेलुगू देशम पार्टी को लोकसभा चुनाव में भी कापुओं का समर्थन मिला और विधानसभा चुनाव में भी। पर मुख्यमंत्री बनने के बाद नायडू टालमटोल करने लगे। काफी देर से जाकर, कापुओं की मांग पर विचार करने के लिए पिछले महीने उन्होंने एक न्यायिक आयोग गठित किया।

नायडू ने एक बार फिर दोहराया है कि वे अपना वादा पूरा करेंगे। जबकि आंदोलनकारी चाहते हैं कि जल्दी से जल्दी इस बारे में शासकीय आदेश जारी किया जाए। सवाल है कि नायडू अगर कापु समुदाय के लिए पिछड़े वर्ग का आरक्षण घोषित कर देते हैं, तो क्या इस वर्ग के अन्य लाभार्थियों में असंतोष नहीं फैलेगा? दूसरे, राज्य सरकार का फैसला क्या न्यायिक समीक्षा में टिक पाएगा? क्या फिर ऐसी ही मांग अन्य समुदायों से नहीं उठेगी? तटीय आंध्र में कापु करीब तेईस फीसद हैं, और जमीन-जायदाद के कारोबार से लेकर राजनीति तक, वे एक ताकतवर समूह हैं।

चंद्रबाबू नायडू को लगा होगा कि अगर कापु वोट उनकी झोली में आ जाएं, तो उनकी चुनावी मुराद पूरी हो सकती है। हुई भी। पर अब उनका ही किया वादा उनके लिए सांसत बन गया है। वाईएसआर कांग्रेस इस मांग को हवा देने में जुटी है। सी रामचंद्रन, बी. सत्यनारायण और चिरंजीवी जैसे कापु समुदाय से आने वाले अन्य दलों के नेता भी सक्रिय हैं, और सबसे ज्यादा सक्रिय हैं पूर्व मंत्री एम पद्मनाभम, जो पहले तेलुगू देशम में थे। पद्मनाभम ने ही रेलमार्ग और राजमार्ग ठप करने के लिए लोगों को उकसाया। पात्रता की शर्तों के मुताबिक आरक्षण पर विचार होगा, या राजनीति को नियंत्रित करने की ताकत के हिसाब से?

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App