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संपादकीयः प्रदूषण पर नकेल

वायु प्रदूषण कम करने के लिए कुछ समय से दिल्ली में लगातार सख्त कदम उठाने के प्रयास हो रहे हैं। इसके लिए अदालतों की तरफ से बराबर दबाव बना हुआ है।

Author January 23, 2016 1:41 AM
प्रदूषण पर नकेल

वायु प्रदूषण कम करने के लिए कुछ समय से दिल्ली में लगातार सख्त कदम उठाने के प्रयास हो रहे हैं। इसके लिए अदालतों की तरफ से बराबर दबाव बना हुआ है। इसी कड़ी में सर्वोच्च न्यायालय ने प्रदूषण मानकों का पालन न करने वाली भवन निर्माता कंपनियों पर रोजाना जुर्माना लगाने का आदेश दिया है। यों रिहाइशी कॉलोनियां बनाते समय फैलने वाले वायु प्रदूषण पर काबू पाने के लिए पहले से कानून है, मगर भवन निर्माता कंपनियां उसकी ज्यादा परवाह नहीं करतीं, क्योंकि जुर्माने की रकम मामूली है।

उन पर एकमुश्त पचास हजार रुपए तक का जुर्माना लगाने का नियम है, पर जो कंपनियां करोड़ों रुपए की परियोजनाओं पर काम करती हैं, उन्हें यह रकम चुकाना मुश्किल नहीं जान पड़ता। इसलिए वे मनमाने तरीके से काम करती देखी जाती हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने तमाम पहलुओं की जानकारी हासिल करने के बाद कहा है कि प्रदूषण फैलाने वाली भवन निर्माता कंपनियों से प्रतिदिन के हिसाब से जुर्माना वसूला जाए।

हालांकि पहले भी हरित न्यायाधिकरण ने आदेश दिया था कि प्रदूषण फैलाने वाली भवन निर्माता कंपनियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएं, मगर उस पर कड़ाई से अमल नहीं हो पाया। अब जब दिल्ली की आबोहवा खराब होने के कारण लोगों की सेहत की फिक्र सता रही है, और यह हर तरफ चर्चा का विषय है, सर्वोच्च न्यायालय ने संबंधित प्राधिकरण को आदेश दिया है कि वह इस प्रवृत्ति पर रोक लगाना सुनिश्चित करे।

भवन निर्माण के दौरान खुदाई, बजरी तोड़ने, मलबा ढोने आदि में भारी मात्रा में गर्द उड़ती है। जिन इलाकों में बड़ी रिहाइशी परियोजनाओं पर काम चल रहा होता है, वहां हर समय भारी शोर का आलम रहता है और आसपास गर्द का गुबार का छाया रहता है। भवन निर्माण में इस्तेमाल होने वाली सामग्री और मलबे की ढुलाई में इस बात की परवाह नहीं की जाती कि जो वाहन इस काम में लगे हैं, वे उचित मानकों का पालन करते हैं या नहीं।

वे सड़क पर रेत, बजरी, मिट्टी, मलबा आदि गिराते हुए चलते हैं, जो उधर से होकर गुजरने वाले वाहनों के पहियों से चिपक कर धूल के रूप में हर वक्त उड़ते रहते हैं। पिछले कुछ सालों में दिल्ली के आसपास के इलाकों में भवन निर्माण का कारोबार काफी बड़े पैमाने पर फैला है। इसमें अनेक बड़ी कंपनियां शामिल हैं, जो उपनगर से लेकर बहुमंजिला इमारतों, मॉलों आदि की करोड़ों-अरबों रुपए की लागत वाली परियोजनाओं पर काम कर रही हैं।

इन परियोजनाओं में हर समय काम चलता रहता है, और हर स्तर पर मशीनों का इस्तेमाल होता है, जिनसे निकलने वाला धुआं भी वायु प्रदूषण बढ़ाने का बड़ा कारण है। मेट्रो रेल परियोजना में भी बड़े पैमाने पर खुदाई, रेत, बजरी, मिट््टी, मलबा आदि की ढुलाई होती है। इसमें अधिकतर काम भीड़ भरे इलाकों में हुआ है, मगर गर्द उड़ने और इसमें इस्तेमाल मशीनों, वाहनों आदि के धुएं से लोगों को वैसी परेशानी कभी नहीं हुई जैसी भवन निर्माण परियोजनाओं से होती है। क्योंकि मेट्रो रेल परियोजनाओं में हर स्तर पर प्रदूषण मानकों का ध्यान

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