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संपादकीय: कामयाबी का सफर

इसरो के प्रति अंतरराष्ट्रीय आकर्षण बढ़ रहा है; विदेशी उपग्रहों को कम लागत में कक्षा में स्थापित करने की अपनी सफलता के कारण इसके मुरीद देशों की तादाद लगातार बढ़ी है।
Author September 27, 2016 05:32 am
(फोटो-टि्वटर)

इसरो यानी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन उन गिने-चुने संस्थानों में है जिन पर भारत मजे से गर्व कर सकता है। एक ऐसे दौर में जब हर तरफ कर्तव्य के प्रति लापरवाही, खुदगर्जी और अनुशासन का अवमूल्यन नजर आता है, इसरो लगन, मेधा और मेहनत की मिसाल बना हुआ है। इसलिए यह स्वाभाविक ही इसरो का शानदार इतिहास है और एक से बढ़ कर एक कीर्तिमान इसके नाम जुड़ते जा रहे हैं। इसी सिलसिले की ताजा कड़ी है सोमवार को श्रीहरिकोटा से पीएसएलवी-सी 35 की लांचिंग। यह अंतरिक्ष में भारत की एक और बड़ी छलांग है। इसके जरिए इसरो ने अब तक के अपने सबसे मुश्किल और लंबे मिशन को अंजाम दिया।

यह रॉकेट आठ उपग्रहों को लेकर गया है। पर उससे भी बड़ी बात है उपग्रहों को अलग-अलग कक्षा में स्थापित करना। ऐसा दुनिया में सिर्फ दूसरी बार हुआ है, इसी से इसरो की ताजा उपलब्धि की अहमियत का अंदाजा लगाया जा सकता है। इन उपग्रहों में भारत के सी-35 स्कैटसैट-1 के अलावा पांच अन्य देशों के सात उपग्रह शामिल हैं। इस प्रक्षेपण में इसरो ने पहली बार मल्टीपल बर्न तकनीक का इस्तेमाल किया है। अंतरिक्ष में रॉकेट इंजन को बार-बार बंद और चालू करने की यह खास तकनीक है। महीने भर पहले भी इसरो ने एक बड़ी तकनीकी सफलता हासिल की थी, जब उसने वायुमंडल की आॅक्सीजन के इस्तेमाल से अत्याधुनिक स्क्रैमजेट रॉकेट इंजन का पहला प्रायोगिक मगर सफल परीक्षण किया था। स्क्रैमजैट का प्रक्षेपण केवल वायुमंडलीय चरण के दौरान होता है, रॉकेट के इंजनों में दहन के लिए र्इंधन और आॅक्सीकारक दोनों होते हैं। फिर, पीएसएलवी तो इसरो की सफलता की पहचान बन चुका है। पीएसएलवी ने पहली सफल उड़ान 1994 में भरी थी। पहले यह तकनीक सिर्फ रूस के पास थी। इसरो ने चंद्र मिशन और मंगल मिशन भी पीएसएलवी से ही लांच किए थे।

ताजा प्रक्षेपण से एक बार फिर जाहिर हुआ है कि इसरो के प्रति अंतरराष्ट्रीय आकर्षण बढ़ रहा है; विदेशी उपग्रहों को कम लागत में कक्षा में स्थापित करने की अपनी सफलता के कारण इसके मुरीद देशों की तादाद लगातार बढ़ी है। अपेक्षया किफायती प्रक्षेपण के चलते इसरो की सेवाएं लेने वाले देशों में अब कई बार विकसित देश भी शामिल हो जाते हैं। ताजा प्रक्षेपण इसका गवाह है। किफायती होने से इसरो की कारोबारी धाक जमी है और उसने 2013 से 2015 के बीच तेरह देशों के अट्ठाईस उपग्रह भेज कर कोई दस करोड़ डॉलर की कमाई की। अंतरिक्ष में विदेशी उपग्रह भेजने का इसरो का व्यावसायिक सफर सत्रह साल पहले शुरू हुआ था, जो कि लगातार नए कीर्तिमान बना रहा है। इस साल बाईस जून तक इसरो चौहत्तर विदेशी उपग्रह प्रक्षेपित कर चुका था, सोमवार को यह तादाद बढ़ कर उनासी हो गई। और उम्मीद की जा सकती है कि इसरो जल्दी ही शतक पूरा कर लेगा। भारत के स्कैटसैट-1 से समुद्र और मौसम के अध्ययन में बड़ी मदद मिलेगी। मौसम का पूर्वानुमान अब पहले से कहीं अधिक सटीक मिल पाएगा। समुद्री तूफान के बारे में अब पहले से कहीं जल्दी पता लगाया जा सकेगा। जाहिर है, स्कैटसैट-1 कृषि और आपदा प्रबंधन में विशेष मददगार साबित होगा। लेकिन इसरो की तमाम महिमा के बरक्स देश में विज्ञान की शिक्षा की हालत कैसी है, यह सवाल भी हमें पूछना चाहिए। इसरो देश में वैज्ञानिक प्रतिभा का एक द्वीप बन कर न रह जाए!

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