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लापरवाही का इलाज

भारत की गिनती दुनिया के उन देशों में होती है जहां स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च बहुत कम होता है।

Author December 4, 2017 5:44 AM
पीड़ित पिता ने बताया कि दोनों नवजात के शव को लेकर जब अस्पताल से घर जाने लगे तो बीच रास्ते में ही एक बच्चे में हलचल महसूस की।

भारत की गिनती दुनिया के उन देशों में होती है जहां स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च बहुत कम होता है। भारत में यह डेढ़ फीसद से भी कम है, जबकि चीन में तीन फीसद से ज्यादा। इसलिए भारत में सार्वजनिक चिकित्सा व्यवस्था हमेशा संसाधनों और कर्मियों की तंगी से जूझती रहती है। जननी सुरक्षा और राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन जैसी योजनाएं भी पर्याप्त आबंटन न मिलने का दंश झेलती रहती हैं। फिर, भ्रष्टाचार और बदइंतजामी की मार ऊपर से। लेकिन भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र एक और बड़ी बीमारी से ग्रसित है और वह बीमारी है लापरवाही और संवेदनहीनता। यह सरकारी अस्पतालों में भी दिखती है और निजी अस्पतालों में भी। सरकारी अस्पताल की निष्ठुरता का एक बड़ा उदाहरण गोरखपुर में जापानी बुखार से पीड़ित सैकड़ों बच्चों की मौत के रूप में आ चुका है। निजी अस्पताल भी कम संवेदनहीन नहीं है, और इसके दो ताजा मामलों ने सबको स्तब्ध कर दिया है। कुछ दिन पहले एक निजी अस्पताल ने डेंगू से पीड़ित एक बच्चे के इलाज का सोलह लाख रुपए का बिल उसके माता-पिता को थमाया। उस बच्चे की मौत भी हो गई। इसकी खबर आई तो निजी अस्पतालों में होने वाली लूट कुछ समय के लिए चर्चा का विषय बनी, वरना निजी अस्पतालों और निजी निदान केंद्रों पर नाजायज बिल वसूले जाने की शिकायतें रोज सुनने में आती हैं, पर कहीं कोई सुनवाई नहीं होती।

एक और निजी अस्पताल में हुए एक वाकये ने भी यह सोचने पर विवश किया है कि इलाज और स्वास्थ्य संबंधी देखभाल के नाम पर क्या हो रहा है! गौरतलब है कि बीते हफ्ते दिल्ली के शालीमार बाग स्थित मैक्स अस्पताल ने जुड़वां नवजात बच्चों को मृत घोषित कर दिया। इनमें से एक बच्चा बाद में जीवित निकला। इस पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कड़ी कार्रवाई का भरोसा दिलाया है, वहीं केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड््डा ने भी इस घटना को काफी दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए आवश्यक कार्रवाई का निर्देश दिया है। दिल्ली चिकित्सा परिषद ने भी मामले का संज्ञान लेते हुए जांच करने का निर्णय किया है। लेकिन सवाल है कि इलाज में बरती जाने वाली लापरवाही और इलाज के दौरान या इलाज के बहाने होने वाली लूट को रोकने के लिए व्यवस्थागत उपाय क्या है?

कहने को स्वास्थ्य को सार्वजनीन अधिकार बनाने की बात जब-तब होती रहती है, पर वास्तव में सरकारों की नीतियां इससे उलट हैं। सरकारों से लेकर नीति आयोग तक, सबका रवैया स्वास्थ्य के क्षेत्र में निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने का है, और नतीजतन एक तरफ सरकारी अस्पतालों की दुर्दशा बढ़ती गई है और दूसरी तरफ केवल कमाई के इरादे से खुलने वाले अस्पतालों की तादाद बढ़ती जा रही है। इस तरह के बहुत-से अस्पतालों के संस्थापक सिर्फ निवेशक हैं, उनका चिकित्सा क्षेत्र से न पेशेवराना संबंध है न भावना का। उनके लिए अस्पताल में पैसा लगाना उसी तरह है जैसे शेयर खरीदना। जहां पैसा बनाना ही मकसद हो, वहां चिकित्सा से जुड़े मूलभूत तकाजे धीरे-धीरे तिरोहित होने लगते हैं। पश्चिम में भी निजी अस्पताल कमाई करते हैं। पर भारत से तुलना करें, तो दो फर्क है। वहां सार्वजनिक चिकित्सा व्यवस्था की साख कायम है। दूसरे, निजी अस्पतालों की बाबत नियमन के कायदे सख्त हैं। पेशेवर नैतिकता क्या होती है, भारत चाहे तो उनसे सीख सकता है।

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