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शहर धुआं धुआं

दिन में भी धुंध का ऐसा आलम है कि कई इलाकों में सौ मीटर तक देख पाना मुश्किल है।

Author November 7, 2016 5:04 AM
दिल्‍ली सहित पूरे एनसीआर में स्‍मॉग का कहर। (Express Photo)

किसी शहर के लिए इससे बड़ी चिंता की बात क्या हो सकती है कि प्रदूषण के चलते वहां के नागरिकों को घर से बाहर न निकलने की चेतावनी जारी करनी पड़े। दिल्ली इन दिनों हवा में घुले जहर से परेशान है। दिन में भी धुंध का ऐसा आलम है कि कई इलाकों में सौ मीटर तक देख पाना मुश्किल है। स्कूलों को अगले तीन दिनों के लिए बंद करना पड़ा है। हवा में घुले जहरीले रसायनों से लोगों के फेफड़े और गुर्दे वगैरह पर बुरा असर पड़ रहा है। ज्यादातर लोगों को सिरदर्द, बुखार, जुकाम-खांसी जैसी परेशानियां झेलनी पड़ रही हैं। यह स्थिति दिवाली के दिन फोड़े गए पटाखों से निकले धुएं और पंजाब, हरियाणा में फसल कटने के बाद खेतों में बचे अवशेष यानी पराली जलाने से उठे धुएं के गुबार की वजह से पैदा हुई है। दिल्ली सरकार और पर्यावरण मंत्रालय इस चुनौती से निपटने के उपाय तलाशने में जुटे हैं। पर्यावरणविदों का कहना है कि जब तक लोग किसी भी तरह का धुआं पैदा करना बंद नहीं करेंगे, इस स्थिति से पार पाना मुश्किल बना रहेगा।

सर्दी का मौसम शुरू होने से पहले और दिवाली के बाद दिल्ली और आसपास के इलाकों में पिछले कई सालों से ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। हर साल लोगों में जागरूकता पैदा करने की कोशिश की जाती है कि वे दिवाली के मौके पर पटाखे न जलाएं। मगर इसका असर कम ही दिखाई देता है। इसी तरह जब पिछले साल दिल्ली में लोगों को सांस लेना मुश्किल हो गया तो सरकारों ने न सिर्फ लोगों से खेतों में फसलों के अवशेष जलाने से बचने की अपील की, बल्कि इसके दोषी पाए जाने वालों पर जुर्माने का भी प्रावधान किया गया। प्रधानमंत्री ने अपने मन की बात कार्यक्रम में भी लोगों से फसलों के अवशेष, कचरा आदि न जलाने की अपील की थी। पर लोगों पर इसका असर नहीं हुआ। इसका नतीजा यह हुआ कि इस साल हवा में जहरीले तत्त्वों की मात्रा इस कदर बढ़ गई कि पिछले सत्रह सालों का रिकार्ड टूट गया।

पर्यावरण प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए पिछले साल राष्ट्रीय हरित पंचाट ने कई कड़े कम उठाने के निर्देश दिए थे। उनमें से बाहरी ट्रकों के शहर में प्रवेश पर रोक लगाने की कोशिश की गई। निजी वाहनों के लिए प्रायोगिक तौर पर सम-विषम योजना चलाई गई। प्रदूषण फैलाने वाले कारखानों के खिलाफ सख्ती की वचनबद्धता दोहराई गई। मगर इन उपायों का कोई उल्लेखनीय नतीजा नहीं निकल पाया। गाड़ियों के अतार्किक इस्तेमाल की प्रवृत्ति पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। नई गाड़ियों की खरीद को नियंत्रित करने का कोई उपाय नहीं निकाला जा सका है। ऐसे में फिलहाल दिल्ली जिस स्थिति से गुजर रही है, उसमें लोगों को इंतजार है कि कब तेज हवा चले, बारिश हो, जहरीली गर्द नीचे बैठे और उन्हें कुछ राहत मिले। मगर इस तरह लोगों को फौरी राहत तो मिल सकती है, समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। हैरानी की बात है कि हर समस्या को लेकर व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने वाले दिल्ली के पढ़े-लिखे लोग अपने कर्तव्यों का पालन करना जरूरी नहीं समझते। हैरानी की बात है कि यह जानते-बूझते हुए भी कि पटाखे, पराली, कचरा आदि जलाने और वाहनों के अतार्किक इस्तेमाल से हवा में जहर की मात्रा कम करना चुनौती बना हुआ है, फिर भी वे इस समस्या से पार पाने में सहयोग करने से क्यों बचते हैं।

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