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बसपा किधर

बसपा में अध्यक्ष के बाद राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का पद ही सबसे अहम होता है।

Author Published on: April 17, 2017 12:34 AM
मायावती का बीजेपी पर हमला

आखिरकार मायावती ने अपने भाई आनंद कुमार को बहुजन समाज पार्टी का उपाध्यक्ष पद सौंप कर बता दिया कि उन्हें भी परिवारवाद से गुरेज नहीं है। इसी के साथ यह अटकल भी खत्म हो गई कि मायावती का सियासी उत्तराधिकारी तथा पार्टी में दूसरे स्थान पर कौन है। इससे पहले पार्टी के राज्यसभा सांसद राजाराम और सतीश चंद्र मिश्र जैसे कई नेता नंबर दो की स्थिति में माने जाते थे। पर अब मायावती ने अटकल की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी है। बसपा में अध्यक्ष के बाद राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का पद ही सबसे अहम होता है। कांशीराम के अध्यक्ष रहते मायावती उपाध्यक्ष थीं और तभी से यह साफ हो गया था कि पार्टी में उनका दर्जा क्या है। लेकिन मायावती ने अपनी सियासी पारी एक कार्यकर्ता के तौर पर शुरू की थी और बरसों उनका संघर्ष का दौर भी रहा। लेकिन आनंद का राजनीतिक अनुभव और पार्टी के काम में भागीदारी किस प्रकार की और कितने दिनों की है? वे अचानक पार्टी के ऊपर थोप दिए गए। पर बसपा काफी पहले से जिस तरह की पार्टी बन गई थी उसकी परिणति शायद इसी रूप में होनी थी। एक आंदोलन और मिशन का बसपा का दावा बहुत पहले धूमिल पड़ गया था और बरसों से पार्टी को मायावती अपनी निजी जागीर की तरह चला रही थीं। उनकी इच्छा ही पार्टी की आचार संहिता थी और उनका हुक्म पार्टी का संविधान।

अविवाहित होने के कारण मायावती के लिए शायद यह दावा करना आसान होता था कि वे परिवारवाद से ऊपर हैं। बल्कि सपा को घेरने के लिए वे कानून-व्यवस्था की बदहाली के अलावा जिस आरोप का सहारा लेती थीं वह परिवारवाद का ही था। पर अब उनकी पार्टी का भविष्य भी परिवार में सिमट गया है। अपने भाई को उपाध्यक्ष पद सौंपने के पीछे उनकी दलील है कि इससे उन्हें लिखा-पढ़ी और दिल्ली से होने वालों कामों में काफी सहूलियत होगी। एक राष्ट्रीय पार्टी के पास दिल्ली में यह जिम्मेवारी संभालने के लिए और कोई नहीं था? और आनंद सबसे उपयुक्त जान पड़े, जिनके पास पहले से अपने विस्तृत कारोबार का ही ढेर सारा काम है! गौरतलब है कि वे कुछ समय से आय कर विभाग तथा प्रवर्तन निदेशालय जैसी केंद्रीय एजेंसियों की नजर में हैं। कहीं पार्टी उपाध्यक्ष बनाए जाने के पीछे उन्हें ‘राजनीतिक कवच’ मुहैया कराने की मंशा तो काम नहीं कर रही है? अब अगर वित्तीय अनियमितता के किसी मामले में आनंद के खिलाफ कार्रवाई होगी, तो महज एक कारोबारी के खिलाफ नहीं, बल्कि बसपा उपाध्यक्ष के खिलाफ भी होगी। और पार्टी यह कह सकेगी कि उसके नेता को नाहक (या सियासी वजहों से) परेशान किया जा रहा है!

आनंद एक समय नोएडा प्राधिकरण मेंक्लर्क थे। मुख्यमंत्री के तौर पर मायावती के तीसरे कार्यकाल (2002-03) में उनके भाग्य ने पलटा खाया और कारोबारी कामयाबी उनके कदम चूमने लगी। फिर जब 2007 में बसपा की सरकार अपने दम पर बनी, तो आनंद कुमार ने कई नई कंपनियां शुरू कीं, खासकर रीयल एस्टेट में। मायावती की गिनती देश के सर्वाधिक धनी नेताओं में होती है; राज्यसभा के लिए अपने नामांकन के समय उन्होंने अपनी संपत्ति एक सौ ग्यारह करोड़ से ज्यादा घोषित की थी। इस पर बसपा को हमेशा बचाव की मुद्रा में आना पड़ता था। फिर, आनंद के वित्तीय रिकार्ड को लेकर पार्टी सहज कैसे महसूस करेगी? मायावती ने बसपा का कैसा भविष्य तय किया है?

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