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आतंक के विरुद्ध

अफगानिस्तान में अमेरिकीसैनिकों को एक पराए परिवेश में मोर्चा संभालना पड़ता है जहां की भाषा और जहां के भूगोल से वे अनजान हैं।

Author Published on: January 29, 2018 5:58 AM
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप। (फाइल फोटो)

एक बार फिर अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ सख्ती दिखाई है। उसने तालिबान और हक्कानी नेटवर्क के छह सरगनाओं पर पाबंदी लगा दी। ये दोनों आतंकी संगठन अफगानिस्तान में सक्रिय हैं। पर ट्रंप प्रशासन के इस फैसले के औचित्य के साथ ही इसकी सीमा भी जाहिर है। प्रतिबंध लगाने की घोषणा के दूसरे ही दिन काबुल में जबर्दस्त विस्फोट हुआ। शनिवार को दोपहर करीब एक बजे हुए इस भयानक विस्फोट में पंचानबे लोग मारे गए और लगभग पौने दो सौ लोग घायल हो गए। धमाका मध्य काबुल में सिदारत चौक के पास जम्हूरियत अस्पताल के सामने हुआ, जहां कई सरकारी कार्यालय स्थित हैं।

इस हमले की जिम्मेदारी तालिबान ने ली है, और इस तरह उसने एक बार फिर अपनी सक्रियता तथा आतंकी साजिशों को अंजाम देने की अपनी ताकत का इजहार किया है। ट्रंप प्रशासन ने अफगानिस्तान में सक्रिय आतंकी संगठनों पर शिकंजा कसने का अपना अभियान तेज कर दिया है, पर दूसरी तरफ आतंकी संगठन भी कोई न कोई वारदात करने की फिराक में रहते हैं। वारदात के बाद या तो वे अफगानिस्तान के दूरदराज के बीहड़ इलाकों में छिप जाते हैं या पाकिस्तान की सीमा में। इसलिए ट्रंप प्रशासन ने तालिबान और हक्कानी नेटवर्क, दोनों पर एक साथ शिकंजा कसा है। जिन छह आतंकवादियों को अमेरिका ने आतंकवादी घोषित किया है और उन पर प्रतिबंध लगाए हैं उनकी अमेरिका के अधिकार क्षेत्र में आने वाली सारी संपत्ति जब्त हो जाएगी। इसके अलावा, इनके साथ अमेरिकी नागरिकों के लेन-देन पर रोक रहेगी। लेकिन ऐसे प्रतिबंधों से जमीनी हालात पर बहुत फर्क नहीं पड़ता।

अफगानिस्तान में अमेरिकीसैनिकों को एक पराए परिवेश में मोर्चा संभालना पड़ता है जहां की भाषा और जहां के भूगोल से वे अनजान हैं। दूसरी तरफ, तालिबान वहीं के हैं और चप्पे-चप्पे से वाकिफ हैं। सवाल है कि इतने बरस वहां जमे रहने के बाद भी अमेरिकी सेना अफगानिस्तान को अपनी आंतरिक सुरक्षा में सक्षम क्यों नहीं बना सकी है! जहां तक पाकिस्तान का सवाल है, वह अगर अफगानिस्तान में अमेरिका के लिए आस्तीन का सांप हो सकता है, तो मददगार भी साबित हो सकता है। शायद इसीलिए नए साल की शुरुआत पाकिस्तान के खिलाफ बेहद कड़वे ट्वीट से करने और फिर उसके अगले रोज साढ़े पच्चीस करोड़ डॉलर की सहायता रोक देने के बावजूद ट्रंप को अब अफगानिस्तान के मद््देनजर पाकिस्तान का सहयोग जरूरी लगता है। ट्रंप चाहते हैं कि आतंकवादियों के पनाहगाह और उनके वित्तपोषण खत्म करने में पाकिस्तान अमेरिका को सहयोग करे। उनके यह कहने के साथ ही, अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने भरोसा दिलाया है कि अफगानिस्तान के बाहर कोई ड्रोन हमला नहीं होगा।

पाकिस्तान पर कभी दबाव बनाने और कभी नरमी बरतने की वजह साफ है, अफगानिस्तान में आपूर्ति के लिए अमेरिका पाकिस्तान के सहयोग पर निर्भर है। ईरान को नाराज करके ट्रंप ने अपनी मुश्किल यों ही और बढ़ा ली है। इसलिए पहले के राष्ट्रपतियों की तरह अब उन्हें भी तालिबान और हक्कानी नेटवर्क से निपटने के लिए पाकिस्तान के सहयोग की अहमियत का अहसास हो रहा है। पर सवाल है कि क्या तालिबान और हक्कानी नेटवर्क को नेस्तनाबूद करने में पाकिस्तान उस हद तक जाएगा जहां तक ट्रंप उससे उम्मीद करते हैं? और क्या ट्रंप आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान पर अपने दबाव को तालिबान तथा हक्कानी नेटवर्क तक सीमित रखेंगे, या लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों को भी उसके दायरे में लाएंगे?

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