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अधरझूल

बैंकों और एटीएम के बाहर लाइनें कम भले हो गई हों, लोग अब भी मुश्किलों का सामना कर रहे हैं।

Author Published on: January 10, 2017 2:48 AM
credit cardतस्वीर का इस्तेमाल प्रतिकात्मक तौर पर।(फाइल फोटो)

बैंकों और एटीएम के बाहर लाइनें कम भले हो गई हों, लोग अब भी मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। यही नहीं, सरकारी रवैए में अनिश्चितता का आलम भी जारी है। केंद्र सरकार ने पहले यह घोषणा की थी कि पेट्रोल पंपों पर क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड से भुगतान करने पर 30 दिसंबर, 2016 तक कोई ट्रांजैक्शन शुल्क नहीं लिया जाएगा, लेकिन यह आदेश कागजों तक सामित रह गया। इससे पहले यह भी कहा गया था कि पेट्रोल पंपों पर उपलब्ध पीओएस (प्वाइंट आॅफ सेल) मशीन से कोई भी व्यक्ति अपने डेबिट या क्रेडिट कार्ड स्वाइप कर दो हजार रुपए तक की नकदी ले सकता था। सरकार की यह घोषणा भी बेकार हो गई थी। काफी समय तक ज्यादातर पेट्रोल पंपों पर पीओएस ही नहीं था। धीरे-धीरे वहां पीओएस मशीनें तो आ गर्इं, लेकिन कार्डों से तेल लेने पर शुल्क लिया जाता रहा। चूंकि यह शुल्क ग्राहक की जेब से जा रहा था, इसलिए पेट्रोल पंप डीलर चुप रहे। शनिवार को स्थिति उस समय बिगड़ी जब एचडीएफसी, एक्सिस और आईसीआईसीआई (बैंकों) ने पेट्रोल पंप डीलरों को नोटिस भेज कर कहा कि अब वे डीलरों से एक फीसद एमडीआर (मर्चेंट डिस्काउंट रेट) वसूलेंगे। गौरतलब है कि देश भर के 56,190 पेट्रोल पंपों में से 53,840 पेट्रोल पंपों पर इन्हीं तीन बैंकों की पीओएस मशीनें हैं। बैकों के हिसाब से 9 जनवरी से वे यह शुल्क काटने वाले थे। लेकिन इस बीच रविवार को आॅल इंडिया पेट्रोल पंप डीलर्स एसोसिएशन ने एलान कर दिया कि रात बारह बजे के बाद क्रेडिट और डेबिट कार्डों को स्वीकार नहीं करेंगे।

नकदी की किल्लत से पहले ही जूझ रहे लोगों के लिए यह स्थिति बेहद संकट वाली हो सकती थी, अगर केंद्र सरकार ने तत्काल बीच-बचाव करके एसोसिएशन के फैसले को टलवाया नहीं होता। हालांकि सोमवार को सरकार ने साफ किया कि तेरह जनवरी के बाद भी कोई एमडीआर नहीं वसूला जाएगा। जबकि इस मुद्दे पर अभी दुविधा बनी हुई है। जानकारों का मानना है कि ये सारी कठिनाइयां वास्तव में नोटबंदी के फैसले जुड़ी हुई हैं। फिर, फरवरी 2016 में सरकार ने अपने एक सर्कुलर में कहा था कि डिजिटल भुगतान पर ग्राहकों को एमडीआर नहीं देना पड़ेगा। ऐसे में स्वाभाविक ही यह सवाल उठता है कि आखिर यह शुल्क फिर किसकी जेब से जाएगा। बैंक खुद इसका भार वहन करने को तैयार नहीं हैं और पेट्रोल पंप एसोसिशएन का कहना है कि उनका कुल मार्जिन ढाई प्रतिशत है। ऐसे में अगर वे एक प्रतिशत एमडीआर दे देंगे तो उनके लिए यह सहनीय नहीं होगा। सरकार की मुश्किल यह है कि वह इन दोनों के बीच कोई तालमेल नहीं बैठा पा रही है। हालांकि पेट्रोलियम मंत्री ने दावा किया है कि कोई न कोई हल निकाल लिया जाएगा। पर पिछले दो महीने में ढेर सारे नियम-कायदे बनाने और रह-रह कर उन्हें बदलने में मशगूल रही सरकार को क्या अपने इकबाल की भी फिक्र नहीं है!

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