Jansatta artical about Traders' anger against sealing in Delhi - संपादकीय : सीलिंग की गुत्थी - Jansatta
ताज़ा खबर
 

संपादकीय : सीलिंग की गुत्थी

शहरी नियोजन के विशेषज्ञों का कहना है कि रिहाइशी तथा व्यावसायिक क्षेत्रों से संबंधित नियम-कायदों में कुछ अंतर तो होना ही चाहिए। अगर दोनों के लिए समान एफएआर होगा, तो रिहाइशी क्षेत्रों की शांति में स्थायी खलल पड़ जाएगा।

Author February 5, 2018 5:47 AM
व्यापारियों को राहत देने के लिए तीन प्रस्तावों को मंजूरी दी गई।

राजधानी दिल्ली में सीलिंग के खिलाफ व्यापारियों का रोष स्वाभाविक है। बहुत सारे लोगों के लिए यह रोजी-रोटी पर आया संकट है। इसलिए हैरत की बात नहीं कि दिल्ली में काफी संख्या में व्यापारी और अनेक व्यापारिक संगठन सड़कों पर उतर आए। उन्होंने दिन का महाबंद भी आयोजित किया। चूंकि कोई भी राजनीतिक दल व्यापारियों का समर्थन खोना नहीं चाहता, इसलिए उनमें सीलिंग के लिए दूसरे को जिम्मेवार बताने की होड़ लग गई। पर किसी के पास इस सवाल का जवाब नहीं है कि आखिर सीलिंग न हो, तो दिल्ली में पार्किंग और यातायात जाम की समस्या से पार पाने का उनके पास क्या उपाय है। व्यापारियों के लगातार विरोध-प्रदर्शनों ने केंद्र को कुछ पहल करने को मजबूर कर दिया। फिर, दिल्ली के उपराज्यपाल की अध्यक्षता में बीते शुक्रवार को डीडीए यानी दिल्ली विकास प्राधिकरण की बैठक हुई। बैठक में व्यापारियों को राहत देने के लिए तीन प्रस्तावों को मंजूरी दी गई। इनके मुताबिक, एफएआर यानी फ्लोर एरिया रेशियो को एक सौ अस्सी से बढ़ा कर तीन सौ पचास कर दिया जाएगा। एफएआर में बढ़ोतरी से बेसमेंट भी सीलिंग के दायरे से बाहर हो जाएंगे। बारह मीटर से चौड़ी सड़कों पर बने गोदामों को नियमित कर दिया जाएगा। इसके बाद भी जो व्यापारी सीलिंग के दायरे में उनके लिए कन्वर्जन शुल्क पर जुर्माना दस गुना से घटा कर दो गुना कर दिया गया है।

वर्ष 2006 में भी सीलिंग को लेकर इसी तरह के हालात बन गए थे। उस समय दिल्ली सरकार के अनुरोध पर केंद्र सरकार ने व्यापारियों की कारोबारी संपत्तियों को सीलिंग से बचाने के लिए अध्यादेश जारी किया था। राहत के ताजा प्रस्तावों से उम्मीद लगाई गई है कि व्यापारियों का गुस्सा काफी हद तक शांत पड़ जाएगा। पर कई विशेषज्ञ इन प्रस्तावों को दिल्ली के हित में नहीं मानते। उनका कहना है कि इन प्रस्तावों के चलते सीलिंग का शोर भले थम जाए, दिल्ली में पार्किंग और यातायात जाम की समस्या और बढ़ जाएगी। सर्वोच्च अदालत की तरफ से गठित निगरानी समिति भी इन प्रस्तावों को ठीक नहीं मानती। यों भी दिल्ली काफी अनियोजित बसी हुई है। तेजी से आबादी बढ़ने से इसका अनियोजित बसाव और विकट रूप ले चुका है। छोटी-छोटी अनगिनत दुकानों पर कोई नियंत्रण नहीं है। इस सब से निपटने के लिए जो मास्टर प्लान बनाया गया अब उसमें संशोधन की बात की जा रही है, ताकि सीलिंग का कोई वैधानिक आधार न रहे। लेकिन पार्किंग की समस्या और यातायात जाम से छुटकारे का उपाय किए बगैर मास्टर प्लान में संशोधन दु:स्वप्न साबित हो सकता है।

शहरी नियोजन के विशेषज्ञों का कहना है कि रिहाइशी तथा व्यावसायिक क्षेत्रों से संबंधित नियम-कायदों में कुछ अंतर तो होना ही चाहिए। अगर दोनों के लिए समान एफएआर होगा, तो रिहाइशी क्षेत्रों की शांति में स्थायी खलल पड़ जाएगा। दिल्ली के लिए आजादी से पहले भी कई मास्टर प्लान आए, और आजादी के बाद भी बने। लेकिन आबादी बढ़ते जाने व अनियोजित बसाहटों के कारण नागरिक सुविधाओं की पहुंच, पार्किंग और आवाजाही की समस्या बढ़ती गई है। अब तो दिल्ली में वायु प्रदूषण भी एक विकराल समस्या बन गया है। ऐसे में, जरूरत केवल कुछ तात्कालिक उपायों या राहत के कुछ कदमों की नहीं, बल्कि एक दीर्घकालीन दृष्टि और मुकम्मल योजना की है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App