Jansatta Artical about People stoning in the Jammu-Kashmir and government - संपादकीय : नरमी की रणनीति - Jansatta
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संपादकीय : नरमी की रणनीति

जम्मू-कश्मीर सरकार के ताजा फैसले से पहली बार अपराध करने या अलगाववादी संगठनों के उकसावे में आकर अपराध कर बैठने वाले युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ने में मदद मिल सकती है।

Author February 5, 2018 5:32 AM
भाजपा सांसद ने बताया भाजपा कब हटाएगी कश्मीर से धारा 370 (image source-Facebook/Express photo)

जम्मू-कश्मीर सरकार के पत्थरबाजी करने वाले करीब दस हजार लोगों के खिलाफ दर्ज मामले वापस लेने के फैसले से घाटी के लोगों की नाराजगी कुछ कम होने की उम्मीद बनी है। इससे गुमराह नौजवानों के सही रास्ते पर आने की उम्मीद भी जगी है। पिछले नौ सालों के दौरान हुई पत्थरबाजी की घटनाओं में बहुत सारे ऐसे युवा शामिल थे, जिन्हें यही नहीं पता कि वे किस मकसद से आपराधिक गतिविधियों का साथ दे रहे थे। उन्होंने बस उन्माद के माहौल और उकसावे में आकर हाथों में पत्थर पकड़ लिया। ऐसे युवाओं के खिलाफ लंबे समय तक मुकदमा चलने और अदालत से दोषी सिद्ध होने पर उनका भविष्य चौपट हो सकता है। ऐसे लोगों के दुबारा गंभीर आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने या फिर दहशतगर्दों का मोहरा बनने की भी आशंका रहती है। छिपी बात नहीं है कि घाटी के बहुत सारे युवा इसलिए भी आतंकवादी या फिर अलगाववादी संगठनों के साथ हो गए हैं, क्योंकि उनके परिजनों के साथ ज्यादतियां हुर्इं। इसलिए जम्मू-कश्मीर सरकार के ताजा फैसले से पहली बार अपराध करने या अलगाववादी संगठनों के उकसावे में आकर अपराध कर बैठने वाले युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ने में मदद मिल सकती है।

अच्छी बात है कि जम्मू-कश्मीर सरकार ने गंभीर अपराध करने वालों के खिलाफ कोई नरमी नहीं बरती है। मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि वे फिलहाल सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून हटाने के पक्ष में नहीं हैं। दरअसल, घाटी में अशांति का माहौल बनाने में सबसे बड़ा हाथ वहां के अलगाववादी संगठनों का है, जो सीमा पार और आतंकी संगठनों की रणनीति के मुताबिक स्थानीय लोगों और युवाओं को भड़काते हैं। करीब दो साल पहले बुरहान वानी के मारे जाने के बाद जिस तरह युवा आजादी के नारे के साथ हाथों में पत्थर लेकर सड़कों पर उतर आए, उसमें इन्हीं संगठनों का हाथ था। इसलिए वहां के गुमराह नौजवानों के खिलाफ कड़ाई के बजाय उन लोगों के साथ सख्ती से पेश आने की जरूरत है, जो घाटी में अशांति का माहौल बनाए रखने का प्रयास करते हैं। इसी के मद्देनजर अलगाववादी संगठनों के खातों पर नजर रखी जानी शुरू हुई, हवाला के जरिए पैसे के प्रवाह पर लगाम कसी गई। इसका बेहतर नजीता भी दिखने लगा है। बीते साल में पत्थरबाजी पर कुछ अंकुश लगा। सेना की सख्ती से भी इस दिशा में सकारात्मक परिणाम नजर आ रहे हैं। इसलिए उचित ही जम्मू-कश्मीर सरकार ने गंभीर अपराधों में शामिल लोगों के साथ कोई रियायत नहीं बरती है।

जम्मू-कश्मीर सरकार ने करीब दस हजार लोगों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने का फैसला इस मुद्दे पर गठित एक समिति की सिफारिशों के मद्देनजर किया है। इससे यह संकेत गया है कि सरकार स्थानीय लोगों से बातचीत के जरिए अमन का रास्ता तलाशने के पक्ष में है। पहले भी कुछ मौकों पर अशांति फैलाने में शामिल लोगों के खिलाफ मामलों को वापस लेने के फैसले किए गए हैं। यहां तक कि जिन गुमराह नौजवानों ने हाथ में बंदूक उठा ली थी और बाद में लगा कि उन्हें मुख्यधारा में लौट आना चाहिए, उनके पुनर्वास की योजना तक चलाई गई। इसलिए ताजा फैसले से लोगों में विश्वास बहाली का रास्ता साफ होगा और इस तरह अलगाववादी ताकतों पर अंकुश कसने में काफी मदद मिलेगी। आम लोगों का भरोसा जीतने के साथ-साथ दहशतगर्दों के खिलाफ सख्ती बनाए रखना वक्त का तकाजा है।

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