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मीडिया की मर्यादा

राज्यसभा के करीब साठ सदस्यों की तरफ से दिए गए विशेषाधिकार हनन के नोटिस ने मीडिया से संबंधित एक गंभीर मसले की तरफ ध्यान खींचा है। नोटिस पर हस्ताक्षर करने वाले सांसद अलग-अलग दलों से ताल्लुक रखते हैं। पिछले दिनों प्रकाशित कुछ खबरों के कारण उन्हें यह असाधारण कदम उठाने की जरूरत महसूस हुई। खबरों […]
Author May 2, 2015 08:13 am

राज्यसभा के करीब साठ सदस्यों की तरफ से दिए गए विशेषाधिकार हनन के नोटिस ने मीडिया से संबंधित एक गंभीर मसले की तरफ ध्यान खींचा है। नोटिस पर हस्ताक्षर करने वाले सांसद अलग-अलग दलों से ताल्लुक रखते हैं। पिछले दिनों प्रकाशित कुछ खबरों के कारण उन्हें यह असाधारण कदम उठाने की जरूरत महसूस हुई। खबरों में कहा गया था कि राज्यसभा टीवी चैनल पर 2010 से 2014 के बीच सत्रह सौ करोड़ रुपए का खर्च आया।

जबकि राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद का कहना है कि उपर्युक्त चार वर्षों में चैनल ने सिर्फ एक सौ छियालीस करोड़ रुपए खर्च किए। इन खबरों में तथ्यात्मक घपला यहीं तक सीमित नहीं था; यह भी बताया गया था कि कैग ने अपनी एक रिपोर्ट में राज्यसभा टीवी की आलोचना की और वित्त मंत्रालय ने चैनल को एक नोट भेजा। जबकि न तो कैग ने कभी ऐसी रिपोर्ट दी न वित्त मंत्रालय ने कोई नोट भेजा। इन निराधार खबरों में चैनल की प्रासंगिकता पर सवाल भी उठाए गए थे, लिहाजा उनके पीछे रही मंशा छिपी नहीं रह सकी है। इन खबरों को विशेषाधिकार हनन मानने के पक्ष में नोटिस में दलील दी गई है कि राज्यसभा टीवी चैनल सदन के सर्वसम्मत निर्णय से शुरू हुआ था। चैनल के काम पर सदन की विषय सलाहकार समिति निगरानी रखती है। नोटिस के बारे में फैसला पीठासीन अधिकारी को करना है। बहरहाल, विशेषाधिकार हनन की परिभाषा से अलग और भी कई बातें विचारणीय हैं।

कोई भी मीडिया संस्थान आलोचना से परे नहीं है, चाहे निजी हो या सार्वजनिक धन से संचालित। लेकिन आलोचना तथ्यों के विपरीत हो, तो वह जान-बूझ कर छवि खराब करने की कोशिश ही कही जाएगी। सरकारी यानी जनता के पैसे से चलने वाले एक प्रसारण संस्थान के रूप में राज्यसभा टीवी ने प्रशंसनीय भूमिका निभाई है। राज्यसभा से जुड़ी खबरें देने और सदन की कार्यवाही के सीधे प्रसारण की अपनी सामान्य जिम्मेदारी निभाने के साथ ही इस चैनल ने सामयिक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विषयों पर चर्चा का स्तर बढ़ाया है। जहां सार्वजनिक प्रसारण कहे जाने वाले दूसरे चैनल अमूमन सरकारी प्रचार का जरिया होकर रह गए हैं, वहीं राज्यसभा टीवी असहमति और आलोचना को भी पर्याप्त स्थान देता रहा है। परस्पर विरोधी मतों के बौद्धिक इसकी चर्चाओं में भागीदारी करते रहे हैं। साथ ही चैनल इस बात को लेकर सचेत और प्रयासरत रहा है कि समाज में सौहार्द और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया जाए। कह सकते हैं कि इस चैनल ने देश में सार्वजनिक प्रसारण का एक प्रतिमान कायम किया है।

इस मामले में बीबीसी को लोकतांत्रिक दुनिया में आदर्श माना गया, जो वित्तीय रूप से सरकार पर निर्भर होते हुए भी सरकारी नियंत्रण से बचा रहा है। द्वितीय विश्वयुद्ध के दिनों में ‘धुरी राष्ट्रों’ के लोग भी बीबीसी पर भरोसा करते थे, भले बीबीसी का अपना देश यानी ब्रिटेन उनके खिलाफ लड़ रहा था। यों हमारे देश में भी सार्वजनिक प्रसारण को स्वायत्त बनाने की बात शुरू हुई और प्रसार भारती की स्थापना की गई। मगर इस पर सूचना प्रसारण मंत्रालय का दखल वैसा ही है जैसा उसके दूसरे विभागों पर। राज्यसभा टीवी अपवाद नजर आता है तो फिलहाल इसका प्रमुख कारण शायद यह होगा कि यह राज्यसभा सचिवालय के तहत काम करता है, और राज्यसभा में सत्तारूढ़ दल का बहुमत नहीं है। एक तरफ निजी चैनल हैं जो व्यावसायिक गणित से सत्ता के साथ चलते हैं, और दूसरी तरफ वे चैनल हैं जो सरकारी भोंपू नजर आते हैं। ऐसे में राज्यसभा टीवी जैसा निष्पक्ष चैनल सत्ता की आंख की किरकिरी भी बन सकता है। जो हो, निष्पक्षता के लिए जगह सिकुड़ती जा रही है। ऐसे में जन-सरोकारों और पत्रकारिता के मूल्यों के लिए ठिकाना कहां होगा!

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