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अवकाश के बाद

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी लगभग दो महीने की छुट्टी बिता कर विदेश से लौट आए। पार्टी कार्यकर्ताओं ने इस पर खुशी जाहिर की। पर कुछ सवाल भी उठे हैं। हमारे देश में राजनेताओं के अवकाश पर जाने की परंपरा नहीं रही है। अगर कोई कुछ दिन एकांत में बिताना चाहता है तो उसे बिना अवकाश […]

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी लगभग दो महीने की छुट्टी बिता कर विदेश से लौट आए। पार्टी कार्यकर्ताओं ने इस पर खुशी जाहिर की। पर कुछ सवाल भी उठे हैं। हमारे देश में राजनेताओं के अवकाश पर जाने की परंपरा नहीं रही है। अगर कोई कुछ दिन एकांत में बिताना चाहता है तो उसे बिना अवकाश का नाम दिए वैसा कर लेता है। इसके लिए देश से बाहर जाने की जरूरत क्यों होनी चाहिए?

पर राहुल गांधी एकांत में रहने के लिए विदेश गए, और वह भी ऐसे समय, जब संसद का सत्र शुरू हो रहा था और बजट से लेकर भूमि अधिग्रहण अध्यादेश जैसे तमाम मसलों पर विपक्ष को मुखर होना था। अवकाश पर जाने के लिए ऐसे वक्त का चुनाव कर उन्होंने अपनी राजनीतिक गंभीरता पर सवाल उठाने का मौका दिया। इन सवालों से परेशान कांग्रेस ने तब सफाई दी थी कि वे पार्टी के भविष्य की कार्य-योजना पर विचार करने के लिए कुछ दिन एकांत में रहना चाहते हैं। पर तब भी वक्त के चुनाव को लेकर सवाल बना रहा। अब जब वे करीब दो महीने बाद लौट आए हैं, तो एक दूसरा प्रश्न भी है। उनके आत्ममंथन से क्या निकला?

रविवार को भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ होने वाली पार्टी की रैली में शिरकत कर राहुल गांधी फिर से अपनी सक्रियता का संदेश दे सकते हैं। पर उत्सुकता इस बात की है कि पार्टी में नई ऊर्जा लाने के लिए उन्होंने इस बीच क्या योजना तैयार की है। लोकसभा चुनाव में और फिर एक के बाद एक कई राज्यों में बुरी तरह शिकस्त खाने के बाद कांग्रेस अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। क्या वह इस संकट से उबर पाएगी?

विडंबना यह है कि राहुल गांधी कांग्रेस का चेहरा तो बन गए, पर खुद उनकी भूमिका को लेकर पूरी पार्टी आश्वस्त नजर नहीं आती। संसदीय बहसों में उन्होंने कभी-कभार ही हस्तक्षेप किया है। वे अपनी पसंद या सुविधा से कोई मुद्दा चुनते हैं और फिर उसे छोड़ देते हैं। अधिकतर मामलों में, जब नेतृत्व से स्पष्ट नजरिए की अपेक्षा की जाती है, वे खामोश बने रहते हैं।

2004 से 2009 के बीच, जब उन पर खासकर पार्टी के छात्र और युवा संगठनों के मार्गदर्शन की जिम्मेदारी थी, उन्होंने अपना काम बखूबी निबाहा। पर 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद, जब कांग्रेस की ताकत पहले से बढ़ गई थी और पार्टी में राहुल गांधी की जिम्मेदारियां भी, उनका प्रदर्शन उत्साहजनक नहीं रहा। मसलन, उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रचार अभियान की कमान उन्हीं के हाथ में थी, पर पार्टी बुरी तरह नाकाम रही। पिछले लोकसभा चुनाव में भी वे पार्टी का चेहरा थे, पर पार्टी को इतनी भी सीटें नहीं मिल सकीं कि वह विपक्ष की मान्यता-प्राप्त पार्टी बन सके। फिर कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी उसकी दुर्गति हुई।

राहुल गांधी न पार्टी की सांगठनिक कमजोरियां दूर कर पाए न चुनावी महारत दिखा सके। इसलिए हैरत की बात नहीं कि वे कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभालें, इस प्रस्ताव को लेकर पार्टी एकमत नहीं दिखती। अगर असहमति के स्वर मुखर होकर सामने नहीं आते, तो इसकी वजह कांग्रेस के वंशवाद में निहित है। पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं में यह धारणा गहरे पैठी हुई है कि लंबे अरसे से चली आ रही इस धुरी से पार्टी हटी तो जल्दी ही बिखर जाएगी। पर पार्टी को अब ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो विपक्ष के उसके प्रदर्शन को धारदार बना सके। कारगर विपक्ष की भूमिका का निर्वाह करके ही कांग्रेस फिर से राष्ट्रीय विकल्प की दावेदार बन सकती है। अवकाश के बाद सबसे अहम सवाल यही है कि राहुल गांधी ने इसकी क्या तैयारी की है।

 

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