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टूट की ओर

पार्टी के भीतर और राष्ट्रीय राजनीति में भी शरद यादव का जो कद रहा है, उसमें स्वाभाविक ही उनके लिए बिना कुछ सोचे-समझे नीतीश कुमार के अपने स्तर पर लिये गए फैसले के साथ जाना मुश्किल था।

भाजपा के साथ मिलकर छठी बार सरकार बनाने वाले नीतीश कुमार से उनके ही पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व अध्यक्ष शरद यादव नाराज बताए जा रहे हैं।

जब पिछले महीने नीतीश कुमार ने पाला बदला, तो राज्यसभा सांसद शरद यादव और अली अनवर ने उनके साथ जाने से इनकार कर दिया था, तभी जनता दल (एकी) का टूटना तय लगने लगा था। सोमवार को पार्टी नेतृत्व ने जिस तरह शरद यादव के समर्थक पूर्व मंत्री रमई राम सहित इक्कीस नेताओं को प्राथमिक सदस्यता से निलंबित कर दिया, उससे साफ है कि अब जद (एकी) के विभाजन की औपचारिक घोषणा भर होना बाकी है। दरअसल, उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के खिलाफ, जो तब उपमुख्यमंत्री थे, एफआइआर दर्ज होने के बाद से ही भाजपा ने नीतीश कुमार को घेरना शुरू कर दिया था। नीतीश असहज रहने या दिखने लगे थे। लेकिन रातोंरात महागठबंधन की सरकार से इस्तीफा देने और अगले ही दिन भाजपा के साथ सरकार बना लेने का उनका फैसला अप्रत्याशित था और इसकी भनक संभवत: पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं को भी नहीं थी। शायद ही पार्टी की किसी नीति निर्धारक समिति में महागठबंधन से अलग होने के बारे में चर्चा हुई हो। जो हुआ वह यह कि अपने प्रभाव के चलते नीतीश ने अपनी फैसला पार्टी से मनवा लिया। पार्टी के भीतर और राष्ट्रीय राजनीति में भी शरद यादव का जो कद रहा है, उसमें स्वाभाविक ही उनके लिए बिना कुछ सोचे-समझे नीतीश कुमार के अपने स्तर पर लिये गए फैसले के साथ जाना मुश्किल था।

हालांकि ऐसी खबरें भी आर्इं कि संभवत: उन्हें मना लिया जाएगा। लेकिन कई दिन तक उनके सार्वजनिक रूप से कोई स्पष्ट राय जाहिर न करने के बावजूद संकेत यही मिल रहे थे कि उन्होंने अलग राह पकड़ ली है। फिर जब सत्रह अगस्त को ‘साझी विरासत’ सम्मेलन के अलावा उन्होंने उससे पहले बिहार के अलग-अलग हिस्सों में जनता से सीधे संवाद कायम करने के लिए यात्रा की घोषणा की, तब एक तरह से सब कुछ साफ हो गया। शरद यादव ने अपनी तीन दिवसीय बिहार यात्रा के दौरान नीतीश कुमार को सीधे कठघरे में खड़ा किया और कहा कि राज्य के ग्यारह करोड़ लोगों की इच्छाओं और जनादेश का अपमान हुआ है। फिर उन्होंने राजद की ओर से सत्ताईस अगस्त को बुलाई गई रैली में शिरकत करने के संकेत दिए। पहले से ही सवालों का सामना कर रहे नीतीश कुमार के लिए यह स्थिति अनुकूल नहीं थी और आखिरकार शरद यादव और उनके समर्थक माने जाने वाले नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। इससे पहले राज्यसभा में पार्टी के नेता के पद से भी शरद यादव को हटा दिया गया था।

जद (एकी) के भीतर नीतीश कुमार और शरद यादव का जो पद और कद रहा है, उसमें तकनीकी रूप से पार्टी पर दावे को लेकर अभी कुछ और जद््दोजहद बाकी है। इस बीच कई राज्यों में पार्टी की इकाइयां पहले ही नीतीश कुमार के फैसले पर अपनी नाराजगी जाहिर कर चुकी हैं। अब बिहार में भी जद (एकी) के भीतर से जैसे संकेत आ रहे हैं उससे लगता है वहां भी पार्टी टूट की तरफ बढ़ रही है। नीतीश कुमार ने उन्नीस अगस्त को पार्टी कार्यकारिणी की बैठक बुलाई है, जिसमें राजग में शामिल होने की औपचारिक घोषणा की जाएगी। जद (एकी) की टूट में किसका पलड़ा भारी होगा, यह बाद की बात है। पर इतना साफ है कि पहले से ही कमजोर विपक्ष को बिहार के इस घटनाक्रम से और झटका लगा है।

 

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