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गठबंधन की गुत्थी

जम्मू कश्मीर में त्रिशंकु विधानसभा ने पीडीपी और भाजपा को साथ आने को विवश किया था। दोनों पार्टियों के गठबंधन में पीडीपी को मुख्यमंत्री पद मिला और भाजपा को उपमुख्यमंत्री पद।

Author नई दिल्ली | January 26, 2016 1:59 AM
या तो महबूबा खुद अपनी विरासत संभालें या किसी और को अपनी जगह बिठाने का काम करें।

यह बेहद अफसोस की बात है कि जम्मू-कश्मीर में तीन हफ्तों से राजनीतिक अनिश्चितता बनी हुई है। मुफ्ती मोहम्मद सईद के निधन के बाद से मुख्यमंत्री की कुर्सी खाली है। त्रिशंकु विधानसभा ने पीडीपी और भाजपा को साथ आने को विवश किया था। दोनों पार्टियों के गठबंधन में पीडीपी को मुख्यमंत्री पद मिला और भाजपा को उपमुख्यमंत्री पद। लिहाजा, मुफ्ती के निधन के बाद उनके उत्तराधिकारी के चयन का दारोमदार पीडीपी पर आ गया। स्वाभाविक ही इसके लिए पार्टी ने महबूबा मुफ्ती को चुना, क्योंकि अपने पिता के बाद, पीडीपी की स्थापना के समय से, पार्टी में उन्हीं का प्रभाव सबसे ज्यादा रहा है। लेकिन अठारह दिन पहले पीडीपी के विधायक दल की नेता चुनी गर्इं महबूबा मुफ्ती ने सरकार के गठन की पहल अभी तक नहीं की है। इस बीच वहां राज्यपाल-शासन भी लागू हो गया। शुरू-शुरू में यही कहा या समझा गया कि अपने पिता की मत्यु के फलस्वरूप शोक में डूबे होने से वे अभी मुख्यमंत्री पद की शपथ लेना नहीं चाहतीं। पर तीन हफ्तों बाद भी क्या वही दलील दी जा सकती है? ऐसा लगता है कि महबूबा मुफ्ती कुछ दुविधा में हैं। आखिर उनका असमंजस क्या हो सकता है? एक समय लग रहा था कि शपथ ग्रहण में वे जान-बूझ कर देरी कर रही हैं, इस मंशा से कि मनचाहे मंत्रालय पाने के लिए भाजपा की तरफ से बनाए जा रहे दबाव से निपट सकें। फिर यह भी अटकल लगाई जाने लगी कि पीडीपी और कांग्रेस के बीच खिचड़ी पक रही है। लेकिन जल्दी ही पीडीपी नेतृत्व ने साफ कर दिया कि इस तरह के कयास बेबुनियाद हैं, भाजपा से उनका गठबंधन बना हुआ है, बना रहेगा। भाजपा की ओर से भी गठबंधन कायम रहने के बयान आए। फिर, नई सरकार का गठन क्यों अधर में है?

अनिश्चितता की स्थिति ने एक बार फिर इस अनुमान को हवा दी है कि हो सकता हैमहबूबा भाजपा से अपनी पार्टी के गठजोड़ पर पुनर्विचार कर रही हों। खुद मुफ्ती मोहम्मद सईद ने पीडीपी और भाजपा को दो ध्रुव कहा था। पीडीपी का एक धड़ा आज भी भाजपा से गठजोड़ को पचा नहीं पाया है। दरअसल, पीडीपी के कुछ नेता सोचते हैं कि बीफ-विरोध जैसे भाजपा के हिंदुत्ववादी एजेंडे से पीडीपी को सियासी नुकसान पहुंचा है, गठबंधन को जारी रखना उसे और नुकसान पहुंचा सकता है। सत्तासी सदस्यीय विधानसभा में भाजपा के पच्चीस विधायक है, पीडीपी के सत्ताईस और कांग्रेस के बारह। पीडीपी क्या कांग्रेस और कुछ निर्दलीय विधायकों के समर्थन से सरकार बनाने को सोच सकती है? यह फिलहाल एक अनुमान भर है। पर ऐसा हुआ भी, तो वह गणित कितना टिकाऊ होगा? महबूबा मुफ्ती के अधरझूल में रहने की एक और वजह यह हो सकती है कि सरकार के गठन से पहले वे यह सुनिश्चित करना चाहें कि पार्टी में उनके परिवार का प्रभुत्व बना रहेगा। उनके छोटे भाई तसद््दुक हुसैन पेशे से सिनेमैटोग्राफर रहे हैं और राजनीति में शिरकत करना तो दूर, वे राजनीतिक चर्चाओं से भी बचते रहे। पर महबूबा ने तसद्दुक को सक्रिय कर दिया है। पिछले दिनों तसद््दुक पार्टी के कोर ग्रुप की बैठक में भी शामिल हुए। तो क्या तसद््दुक को पार्टी में अहम भूमिका देने की तैयारी चल रही है, और पार्टी इसे आम राय से स्वीकार कर लेगी? जो हो, सरकार की बाबत अनिश्चितता की स्थिति ठीक नहीं है, और महबूबा को चाहिए कि इस पर जल्द से जल्द विराम लगाएं।

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