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राहत की बैठक

अंतरराष्ट्रीय पटल पर अमेरिका और रूस को आमतौर पर स्वाभाविक प्रतिद्वंद्वी के तौर पर देखा जाता रहा है।

सांकेतिक फोटो।

अंतरराष्ट्रीय पटल पर अमेरिका और रूस को आमतौर पर स्वाभाविक प्रतिद्वंद्वी के तौर पर देखा जाता रहा है। शायद ही कभी ऐसा वक्त आया हो जब किसी आकलन में यह बताया गया कि दोनों देशों के बीच संबंध सौहार्दपूर्ण और दोस्ताना हैं। विश्व स्तर पर शक्ति संतुलन के मैदान में दोनों ही खुद को सबसे बड़ी ताकत के तौर पर देखे और माने जाने के लिए हर वक्त जतन करते रहते हैं।

इसी क्रम में अक्सर ऐसा हुआ है जब तल्खी एक हद को पार कर गई और दुनिया को लगने लगा कि अगर हालात को समय रहते संभाला नहीं गया तो बड़ा संकट खड़ा हो सकता है, जिसमें बहुत सारे देशों को नाहक ही उलझना पड़ेगा और उसके खमियाजे भी उठाने होंगे। इस लिहाज से देखें तो बुधवार को जेनेवा में अमेरिका और रूस के राष्ट्रपति के बीच हुई बैठक को बेहद अहम माना जा रहा है। हालांकि जो बाइडेन और ब्लादिमिर पुतिन की बैठक के नतीजे के तौर पर दोनों ओर से कुछ घोषणाएं हुई हैं, लेकिन दोनों देशों के बीच टकराव के जो मुद्दे रहे हैं, उसके मद्देनजर आने वाले दिनों में यह देखना होगा कि उनका क्या हल निकाला गया है।

दरअसल, पिछले कुछ समय से रूस और अमेरिका के बीच लगातार तनाव बना हुआ था, जासूसी, मानवाधिकार और राजनयिकों की वापसी आदि मसलों पर आरोप-प्रत्यारोप चल रहे थे। ऐसे में अव्वल तो इस तरह की बैठक में सहजता की उम्मीद नहीं थी, दूसरे यह माना जा रहा था कि इसका कोई ठोस नतीजा नहीं निकलेगा। लेकिन इस बुरे दौर में दोनों देशों के राष्ट्रपति जब मिले तो उन्होंने खासा वक्त लिया।

इसके बाद पुतिन ने बैठक को ‘बेहद रचनात्मक’ बताया तो जो बाइडेन ने ‘सकारात्मक’ कहा। यानी दोनों के रुख में प्रथम दृष्टया नरमी के मद्देनजर तस्वीर में बदलाव की उम्मीद की जा सकती है। मगर कई अहम बिंदुओं पर जो दूरी दिखी, उससे साफ है कि ताजा बैठक तभी ठोस नतीजे दे पाएगी, जब दोनों पक्षों के बीच औपचारिकता से आगे बढ़ने की इच्छाशक्ति हो। मसलन, साइबर सुरक्षा के मसले पर रूस और अमेरिका सहमत हैं, लेकिन जब तक इससे संबंधित कोई कदम उठा कर इस पर पहल नहीं की जाती, तब तक इस सहमति का कुछ हासिल सामने नहीं आएगा।

गौरतलब है कि हाल ही में टेक्सास में अमेरिकी तेल पाइपलाइन प्रणाली पर हुए हमले को दुनिया भर के लिए एक गंभीर साइबर चुनौती माना गया था। इसके समांतर रूस की स्वास्थ्य व्यवस्था भी इसी तरह के साइबर हमले का शिकार हुई। अगर इस प्रवृत्ति का विस्तार हुआ तो प्रत्यक्ष युद्ध के बजाय इस तरह के हमलों से किस पैमाने का नुकसान हो सकता है, इसका सिर्फ अंदाजा लगाया जा सकता है। याद रखा जाना चाहिए कि दोनों ही देश परमाणु शक्ति से लैस हैं और खुद को एक दूसरे से कम करके नहीं देखते हैं।

यों ताजा बैठक के बाद दोनों पक्षों के साझा बयान में यह कहा गया कि परमाणु युद्ध कभी नहीं जीते जा सकते और कभी नहीं होने चाहिए। उम्मीद है कि साइबर संजाल के टकराव में इस संवेदनशील पहलू पर पर्याप्त सावधानी बरती जाएगी। लेकिन क्या यह सदिच्छा हथियारों के नियंत्रण के मामले में भी एक वास्तविक कार्ययोजना भी सामने लेकर आएगी? इसके अलावा, अमेरिका की नजर में रूस में एलेक्सी नवेलनी की गिरफ्तारी मानवाधिकार हनन का मुद्दा है तो रूस यह मानता है कि अपने आंतरिक मसलों पर उसे अमेरिका के भाषण की जरूरत नहीं है। बहरहाल, तनाव के गहराते दौर में दोनों देशों के राष्ट्रपतियों के बीच हुई इस बैठक पर दुनिया भर की निगाहें टिकी थीं, लेकिन दोनों देशों के बीच संबंधों की जटिलता के मद्देनजर सकारात्मक नतीजों के लिए शायद इंतजार करना पड़े।

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