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संपादकीयः योजना पर पलीता

आम लोगों को सस्ती और गुणवत्ता वाली दवाइयां मुहैया कराने के मकसद से शुरू किए गए जन औषधि केंद्रों का नहीं चल पाना चिंताजनक है।

Author June 5, 2018 03:09 am
जन औषधि केंद्र खोले जाने की रफ्तार ही बताती है कि इसके प्रति सरकार खुद कितनी उदासीन रही।

आम लोगों को सस्ती और गुणवत्ता वाली दवाइयां मुहैया कराने के मकसद से शुरू किए गए जन औषधि केंद्रों का नहीं चल पाना चिंताजनक है। ज्यादातर जन औषधि केंद्र ठप पड़े हैं। उत्साह और बेहतर भविष्य की उम्मीद के साथ जिन लोगों ने जन औषधि केंद्र खोले थे, वे अब इन्हें बंद कर रोजगार का नया विकल्प तलाशने को मजबूर हैं। जन औषधि केंद्रों का दवा बाजार में नहीं टिक पाना जहां सरकार की लापरवाही और उदासीनता को दर्शाता है, वहीं यह हमारे स्वास्थ्य क्षेत्र की बिगड़ती हालत और उसमें फैले भ्रष्टाचार की ओर भी इशारा करता है। कहने को देश में इस वक्त तीन हजार छह सौ चौदह जन औषधि केंद्र हैं, लेकिन हकीकत यह है कि ज्यादातर केंद्रों में दवाइयां नहीं हैं। ऐसे में जब लोगों को सस्ती दवाइयां नहीं मिल पा रही हों तो ऐसी योजना पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।

जन औषधि केंद्र योजना की शुरुआत वर्ष 2008 में यूपीए सरकार ने इस मकसद से की थी कि जेनेरिक दवाएं आसानी से उपलब्ध हों और मरीजों को महंगी दवाएं खरीदने की विवशता से बचाया जा सके। तब यह तय हुआ था कि सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर जेनेरिक दवाएं लिखेंगे। वर्ष 2013 में भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआइ) ने तो बाकायदा निर्देश जारी कर डॉक्टरों से कहा था कि जहां तक संभव हो सके, जेनेरिक दवाएं ही लिखें। लेकिन लगता है सरकार की इस कल्याणकारी योजना को सबसे पहले पलीता लगाने का बीड़ा डॉक्टरों ने ही उठाया। हालत यह है कि डॉक्टर जेनेरिक दवाइयां लिखते ही नहीं हैं। ऐसे में जन औषधि केंद्र पर मरीज क्या करने जाएगा! जन औषधि केंद्रों को दवा आपूर्ति की जिम्मेदारी सरकारी कंपनी ‘ब्यूरो ऑफ फार्मा पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग ऑफ इंडिया’ की है। पर उसके जिम्मेदारी निभाने का आलम यह है कि ज्यादातर केंद्रों पर दवाइयां पहुंच ही नहीं पातीं। कंपनी सात सौ दवाओं की आपूर्ति का दावा करती है, लेकिन ढाई सौ से तीन सौ दवाइयां ही पहुंचती हैं। हालत यह है कि अनेक जन औषधि केंद्रों पर मधुमेह और कैल्शियम की जरूरी दवाएं भी नहीं मिल रहीं। इसी का फायदा उठा कर डॉक्टर मरीजों को दूसरी कंपनियों की महंगी दवाइयां लिखते हैं। यह किसी से छिपा नहीं है कि ब्रांडेड दवा कंपनियां अपना कारोबार बढ़ाने के लिए किस तरह से डॉक्टरों को लाभ पहुंचाती हैं।

जन औषधि केंद्र खोले जाने की रफ्तार ही बताती है कि इसके प्रति सरकार खुद कितनी उदासीन रही। योजना शुरू होने के पांच साल बाद यानी 2013 तक केवल एक सौ सत्तावन औषधि केंद्र खुल पाए थे। फिर योजना में संशोधन किया गया और अगले चार साल में तीन हजार केंद्र खोलने का लक्ष्य रखा गया। वर्ष 2014 में मात्र ग्यारह नए केंद्र खोले गए। वर्ष 2015 में इस योजना को नया कलेवर मिला, जब प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र योजना शुरू हुई। यों आज साढ़े तीन हजार से ज्यादा केंद्र हैं, पर ठप पड़े हैं। कई राज्य सरकारों ने भी इसमें इसलिए दिलचस्पी नहीं दिखाई कि उनके अपने दवाखाने मुफ्त में दवाइयां देते हैं। भारत कई देशों को जेनेरिक दवाएं बेचता है। सरकारी अस्पतालों में भी इनकी खपत काफी है। ब्रांडेड कंपनियों के मुकाबले ये चालीस से अस्सी फीसद सस्ती भी हैं। खुले बाजार में मांग भी जबर्दस्त है। बावजूद इसके जन औषधि केंद्र क्यों नहीं चल पा रहे, यह गंभीर सवाल है।

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