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संपादकीयः इसरो की उड़ान

शुक्रवार का दिन एक बार फिर इसरो यानी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के इतिहास में एक शानदार कामयाबी दर्ज कर गया।
Author June 24, 2017 03:20 am

शुक्रवार का दिन एक बार फिर इसरो यानी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के इतिहास में एक शानदार कामयाबी दर्ज कर गया। आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा से सुबह इसरो ने तीस सह-उपग्रहों के साथ कार्टोसैट-2 शृंखला के उपग्रहों का प्रक्षेपण किया। गौरतलब है कि इसरो की व्यावसायिक शाखा एंट्रिक्स कॉरपोरेशन लिमिटेड के जरिए भारत के एक उपग्रह के अलावा कार्टोसैट-2 के साथ जिन चौदह देशों के उनतीस अंतरराष्ट्रीय उपभोक्ता उपग्रहों का प्रक्षेपण हुआ है, उनमें आॅस्ट्रिया, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका भी शामिल हैं। जाहिर है, इसरो ने अपनी शानदार कामयाबियों से दुनिया के विकसित देशों का भी भरोसा अर्जित किया है कि और वे अब अपने उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए भारत का रुख कर रहे हैं। इस कामयाबी के साथ ही इसरो की ओर से भेजे गए अंतरिक्ष अभियानों की संख्या नब्बे तक पहुंच गई है।

ज्यादातर उपग्रहों की तरह कार्टोसैट- 2 का मकसद भी पृथ्वी पर नजर रखना है। लेकिन भारत की रक्षा व्यवस्था को और दुरुस्त करने के लिहाज से भी ये प्रक्षेपण अहम हैं। आतंकी शिविरों का पता लगाने और बंकरों की साफ तस्वीरें मुहैया कराने में कार्टोसैट-2 शृंखला के उपग्रह काफी मददगार साबित होंगे। बल्कि ये उपग्रह इस तरह की सुविधाओं से लैस हैं कि किसी निर्धारित जगह की कोई खास तस्वीर भी खींच सकते हैं। दरअसल, इसी शृंखला की पिछली सेटेलाइट से मिली तस्वीरों की मदद से ही भारत ने नियंत्रण-रेखा पर पाकिस्तान के कई आतंकी शिविरों को नष्ट कर दिया था। हालांकि जिन तीस उपग्रहों का प्रक्षेपण हुआ है, उनमें भारत का सिर्फ एक है, फिर भी इसके महत्त्व का अंदाजा लगाया जा सकता है। करीब साल भर पहले पूरी तरह स्वदेशी अंतरिक्ष यान के सफल प्रक्षेपण के बाद ही यह उम्मीद जाहिर की गई थी कि आने वाले दिनों में अंतरिक्ष की उड़ान की लागत में दस गुना तक कमी आ सकती है। यह सब विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नए प्रयोगों के साथ प्रक्षेपण के खर्च में भारी कमी की वजह से भी होगा। अब दुनिया के विकसित माने जाने वाले देश भी अपने उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए इसरो के एंट्रिक्स पर भरोसा कर रहे हैं, तो उसके पीछे एक बड़ा कारण शायद यह भी है।

यों, मंगल मिशन और चंद्र मिशन की शानदार सफलता के बाद इसरो की क्षमता और उस पर भरोसे में इजाफा स्वाभाविक है। इस मामले में उपग्रहों के प्रक्षेपण की उन्नत तकनीक विकसित किए बिना आत्मनिर्भर होने की अहमियत को इसरो ने समझा है और पिछले डेढ़-दो दशक के दौरान लगातार कोशिशों से यह क्षमता अर्जित की है। इस क्षेत्र में इसरो के बढ़ते कौशल का ही नतीजा है कि वे देश भी अंतरिक्ष विज्ञान में भारत के साथ सहयोग करने के लिए हाथ बढ़ा रहे हैं। आज अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम की बदौलत भारत तीस देशों के साथ आपदा प्रबंधन आदि के मामले में सहभागिता कर रहा है। पहले की तमाम उपलब्धियों के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए इसरो ने फिर एक नया अध्याय जोड़ा है। सवाल है कि इसरो जैसी लगन, नवोन्मेषिता और प्रतिभा देश की दूसरी वैज्ञानिक संस्थाओं में क्यों नहीं दिखती!

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