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शांति का संकट

फारस की खाड़ी में जिस तरह की मोर्चाबंदी हो चुकी है, अत्याधुनिक परमाणु मिसाइलों से सुसज्जित विशालकाय अमेरिकी नौसेना के बेड़े खाड़ी में खड़े हैं, लड़ाकू जहाज आकाश में चौबीसों घंटे मंडरा रहे हैं।

Author June 24, 2019 1:22 AM
दोनों देशों के बीच तनातनी तभी से ज्यादा बढ़ी है जब अमेरिका ने ईरान के साथ किए परमाणु समझौते से अपने को अलग कर लिया था।

ईरान पर हमले करने से अमेरिका भले पीछे हट गया हो, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आने वाले दिनों में यह खतरा और बढ़ेगा। फारस की खाड़ी में जिस तरह की मोर्चाबंदी हो चुकी है, अत्याधुनिक परमाणु मिसाइलों से सुसज्जित विशालकाय अमेरिकी नौसेना के बेड़े खाड़ी में खड़े हैं, लड़ाकू जहाज आकाश में चौबीसों घंटे मंडरा रहे हैं, तो यह दुनिया को गंभीर संकट की ओर धकेलने का संकेत है। युद्ध भले न हो, लेकिन यह तनाव युद्ध से ज्यादा विनाशक तस्वीर पेश कर रहा है। हाल में मामला तब गरमाया जब अमेरिका का एक ड्रोन विमान मार गिराया गया। किसने गिराया, यह अलग और विवाद का विषय है। इस पर परस्पर विरोधी दावे किए जा रहे हैं। इसकी तोहमत अमेरिका ने ईरान पर मढ़ी है, जबकि ईरान लगातार इसका खंडन कर रहा है। ईरान पर हमले का फैसला ट्रंप ने इसी घटना के बाद किया। लेकिन ईरान पर हमला शुरू होने के ठीक दस मिनट पहले ट्रंप ने अचानक जिस तरह हमला नहीं करने का फैसला कर डाला, उससे साफ है कि अमेरिका अपने को इस संकट में ईरान के मुकाबले कहीं ज्यादा घिरा हुआ पा रहा है और नफे-नुकसान के आकलन में लगा है। इस बीच, ईरान पहले ही यूरेनियम संवर्धन का काम तेज करने की बात कह चुका है। जाहिर है, राष्ट्र की सुरक्षा के लिए परमाणु हथियार बनाने की दिशा में उसके कदम और तेजी से बढ़ेंगे। तब कैसे शांति के बारे में सोचा जा सकता है?

दोनों देशों के बीच तनातनी तभी से ज्यादा बढ़ी है जब अमेरिका ने ईरान के साथ किए परमाणु समझौते से अपने को अलग कर लिया था। अमेरिका के सहयोगी राष्ट्र भी इसे ट्रंप की हठधर्मिता ही बताते रहे हैं। जाहिर है, अमेरिका ईरान को परमाणु हथियार बनाने की आड़ में विवाद में फंसा कर उस पर हमला करने की तैयारी में लंबे समय से है। ठीक ऐसा ही उसने इराक के साथ किया था। इराक पर जैविक हथियार बनाने का आरोप लगा कर उस पर हमला किया गया, लेकिन बाद में इराक के पास जैविक हथियार जैसा कुछ नहीं मिला था। अमेरिका इराक की तरह ही ईरान के तेल पर भी कब्जा करना चाहता है। लेकिन जिस तरह से रूस ईरान के साथ खड़ा है और चीन भी अमेरिका के खिलाफ है, उस सूरत में ईरान पर हमला आसान नहीं है। पिछले डेढ़ महीने में ओमान की खाड़ी से गुजरने वाले तेल टैंकरों पर हमले की घटनाएं तो महज युद्ध का कारण बनाने के लिए हैं। दुनिया में सबसे ज्यादा तेल टैंकर इसी खाड़ी मार्ग से गुजरते हैं, इस लिहाज से भी यह दुनिया का सबसे संवेदनशील इलाका है। ऐसे में अगर युद्ध छिड़ा तो सबसे बड़ा और पहला संकट अंतरराष्ट्रीय तेल कारोबार पर आएगा। इसे अमेरिका भी बखूबी समझ रहा है और इसीलिए दुनिया के कई देशों ने उस पर युद्ध टालने के दबाव भी डाला।

ट्रंप अगले साल राष्ट्रपति चुनाव में फिर मैदान में होंगे। फ्लोरिडा में तीन दिन पहले उन्होंने प्रचार अभियान की शुरुआत भी कर दी। इसलिए वे ईरान के मुद्दे को अभी जिंदा रखेंगे, ताकि अमेरिका जनता को पहले की तरह ही यह भरोसा दिला सकें कि ईरान जैसे देश से निपटने की ताकत उन्हीं में है। इस बात को ट्रंप भी जानते हैं और दुनिया के सारे ताकतवर देश भी कि आज परमाणु हथियारों के युग में युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। युद्ध का मतलब है- मानव जाति का विनाश। ऐसे में युद्ध टालने और शांति के उपाय खोजने में ही मानव कल्याण है।

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