ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजराइल के हमले शुरू होने के बाद युद्ध में अब जो तौर-तरीके अपनाए जाने की खबरें आ रही हैं, उससे यह चिंता गहराने लगी है कि इसका असर किस रूप में सामने आएगा। हैरानी की बात यह है कि दुनिया भर में परमाणु या व्यापक विनाश के हथियारों और अन्य मसलों की अपनी सुविधा के मुताबिक व्याख्या करने वाला अमेरिका खुद कई बार सारे तकाजों के खिलाफ जाकर अंतरराष्ट्रीय कानूनों के प्रति भी उपेक्षा भाव प्रदर्शित करता है।

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध में दोनों पक्षों की ओर से एक-दूसरे पर मिसाइल दागे जा रहे हैं और व्यापक पैमाने पर जानमाल की क्षति हो रही है, लेकिन अमेरिका और इजराइल के साझा हमले में कई ऐसे ठिकानों पर भी बमबारी की गई, जिसके पर्यावरणीय और मानवीयता पर असर को लेकर दुनिया भर में सवाल उठे हैं।

मसलन, प्रतिद्वंद्विता के क्रम में या ईरान को झुकाने के लक्ष्य से वहां एक स्कूल पर हमले के अलावा कई शहरों में तेल ठिकानों पर मिसाइल दागे गए। उससे बाद वहां जैसे हालात पैदा हो रहे हैं, उसका असर दीर्घकालिक होगा और इसकी मार सिर्फ आम लोगों को झेलनी होगी।

एक ओर विश्व भर में यह उम्मीद की जा रही है कि इस युद्ध की वजह से तेल और गैस के साथ-साथ अन्य कई मोर्चों पर व्यापक संकट गहराने के मद्देनजर शांति की राह खोजी जाएगी, दूसरी ओर खबर यह आई कि अमेरिका ने शनिवार को ईरान के खर्ग द्वीप पर हमला करके मसले को और जटिल स्वरूप दे दिया।

हालांकि अमेरिका का कहना है कि उसने केवल सैन्य ठिकानों पर हमला किया और तेल ढांचों को निशाना नहीं बनाया। मगर खर्ग द्वीप को जिस तरह ईरान के सबसे बड़े तेल भंडार और नब्बे फीसद कच्चे तेल के निर्यात के केंद्र के रूप में जाना जाता है, उसमें कहना कठिन है कि हमलों का असर सीमित होगा।

अगर हमलों की जद में तेल भंडार भी आए, तो उसके नतीजों की कल्पना की जा सकती है। फिर इस पर ईरान की प्रतिक्रिया क्या होगी, खाड़ी देशों में स्थित तेल रिफाइनरियों पर कैसा खतरा पैदा होगा, कहना मुश्किल है।

इस क्रम में बड़े पैमाने पर तेल ठिकाने नष्ट होते हैं, तो आने वाले वक्त में दुनिया भर में संकट गहराएगा। युद्ध की चरम अवस्था में भी यह उम्मीद की जाती है कि इसमें शामिल देश संघर्ष की स्थिति में तय किए गए नियम-कायदों और मानवीयता का खयाल रखेंगे। मगर हालत यह है कि इस संबंध में मानवीय प्रश्नों की तो दूर, युद्ध को लेकर बने अंतरराष्ट्रीय कानूनों को बिना किसी हिचक के धता बताया जा रहा है।

विश्व भर में इसे लेकर चिंता जताई जा रही है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ईरान पर अमेरिका-इजराइल के हमले की निंदा कर चुके हैं। रूस भी कह चुका है कि हम जिस अंतरराष्ट्रीय कानून की बात करते हैं, वह लगभग खत्म हो चुका है।

इसके अलावा, तेल ठिकानों पर हमले के बाद बहुत बड़े दायरे में जो पर्यावरणीय प्रभाव सामने आ रहे हैं, उसका खमियाजा आखिर कौन भुगतेगा?

खबर यह भी आई कि अमेरिका और इजराइल के हवाई हमलों के बाद ईरान के आसमान से काली स्याही जैसा तरल बरस रहा है। अंधाधुंध हमलों के बाद युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में आम लोगों की जिंदगी जिस हालत में पहुंच गई है और मानवीयता के सभी तकाजे दरकिनार किए जा रहे हैं, वह सबके लिए चिंता का विषय होना चाहिए।