जब दो या अधिक देशों के बीच युद्ध का मोर्चा खुलता है, तो उसका असर सिर्फ इस रूप में सामने नहीं आता कि एक-दूसरे पर किए गए हमले के नतीजे में जानमाल की व्यापक क्षति होती है। बल्कि जंग के लंबा खिंचने पर कई स्तरों पर जरूरी सामग्री की आपूर्ति बाधित होती है और नतीजतन बाजार में लगभग सभी चीजों की कीमतें तेजी से बढ़ने लगती हैं।

ईरान पर इजरायल और अमेरिका के साझा हमले के बाद जिस बात का डर था, उसकी शुरुआत अब हो चुकी है। यानी जो देश इस जंग में शामिल नहीं हैं, उन तक भी इसकी आंच पहुंचनी शुरू हो चुकी है। हाल ही में भारत के शेयर बाजार पर भी इसका असर देखा गया, जहां बड़ी गिरावट की वजह से निवेशकों को लगभग उन्नीस लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।

चूंकि युद्ध की तीव्रता में फिलहाल कोई नरमी नहीं देखी जा रही है, इसलिए यह स्थिति अभी कायम रहने की आशंका है। मगर इससे इतर अब युद्ध का असर देश के आम लोगों के घर के दरवाजे तक पहुंचना शुरू हो चुका है। मसलन, रसोई गैस की कीमत में साठ रुपए की बढ़ोतरी कर दी गई है।

कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होने की वजह से भारत सहित अन्य कई देशों को नए रास्तों की ओर देखना पड़ रहा है। इस बीच कच्चे तेल की कीमतों के सौ डालर प्रति बैरल तक पहुंचने की आशंका जताई जा रही है।

अंदाजा लगाया जा सकता है कि बाजार के इस रुख का असर कहां तक जा सकता है और अगर युद्ध लंबा खिंचा, तो वैसे देशों में कैसी मुश्किल पैदा होगी, जहां की अर्थव्यवस्था और जीवनयापन का एक बड़ा हिस्सा बाहर से आपूर्ति पर निर्भर है।

इजरायली हमले के बाद प्रतिक्रिया में ईरान ने जो रुख अख्तियार किया है, उससे पहले ही कई मुख्य तेल उत्पादक देशों में असुरक्षा का माहौल है। फिर होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों के रास्ते को ईरान ने जिस तरह बाधित कर दिया है, उससे दुनिया के एक बड़े हिस्से में तेल की आपूर्ति प्रभावित होगी।

होर्मुज की नाकाबंदी की वजह से उस इलाके में फंसे जहाजों को लंबा रास्ता तय करना होगा। भारत के सामने ही स्थिति यह है कि इसके पास अगले छह से आठ हफ्ते का तेल भंडार है। स्वाभाविक ही भारत को अब तेल के लिए अन्य वैकल्पिक स्रोतों की ओर देखना होगा।

राहत की बात यह है कि एक ओर रूस ने भारत को तेल बेचने की पेशकश की, तो दूसरी ओर अमेरिका ने भी इस मसले पर नरम रुख अपनाया है। इसके बावजूद पश्चिम एशिया में चल रहे इस युद्ध का असर केवल वैश्विक स्तर पर तेल और गैस के बाजारों पर ही नहीं पड़ा है, बल्कि तनाव में बढ़ोतरी कई बड़े उद्योगों के लिए भी चिंता का कारण बन रहा है, क्योंकि इस क्षेत्र के लिए कच्चे माल की आपूर्ति भी बाधित हो रही है।

खासतौर पर तेल की कीमतों में भारी उछाल आना और इसका असर बाजार में अन्य लगभग सभी सामान पर पड़ना तय माना जा रहा है। दरअसल, इसके समांतर माल ढुलाई के महंगा होने की वजह से सब्जियों से लेकर दूसरी कई जरूरी चीजों के दाम भी बढ़ेंगे।

निश्चित रूप से इससे प्रभावित देशों को अपने स्तर पर विकल्प और समाधान निकालने की जरूरत है। मगर सवाल है कि क्या युद्ध में शामिल देशों को इस बात की फिक्र है कि उनकी वजह से दुनिया भर में आम लोगों के सामने अपनी अनिवार्य जरूरतें पूरी करने के लिए जद्दोजहद के कितने मोर्चे खुल गए हैं।