Iran-Israel War: पिछले कुछ समय से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिस तरह के हालात बने हुए हैं, उसमें ऐसा लगता है कि कई मोर्चों पर प्रतिद्वंद्वी देशों के बीच विवादित मुद्दों को सुलझाने के लिए संवाद के बजाय संघर्ष को ही आखिरी हल मान लिया गया है। हैरानी की बात यह है कि युद्ध के खिलाफ शांति का पाठ पढ़ाने वाले कुछ ताकतवर देशों के नेताओं को भी अपने प्रभाव से संघर्ष को टालने के रास्ते तलाश करना प्राथमिक नहीं लगता।

इसके उलट वे तनाव को सीधे टकराव में तब्दील करने वाले अभियानों में शामिल होना जरूरी समझने लगे हैं। बीते कुछ महीनों से इजराइल और अमेरिका ने ईरान के खिलाफ जिस तरह का माहौल बनाना शुरू किया था, उससे साफ था कि अगर विवाद के मूल बिंदुओं को केंद्र में रख कर अंतरराष्ट्रीय मंचों की मध्यस्थता में बिना देरी किए संबंधित पक्षों के बीच वार्ता की गुंजाइश नहीं निकाली गई, तो हालात को संभालना मुश्किल होगा।

ऐसी स्थिति के बीच शनिवार को इजराइल और अमेरिका ने ईरान पर साझा हमला करके अपनी मंशा साफ कर दी। अपने हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत को इजराइल और अमेरिका बेशक अपनी कामयाबी मानें, लेकिन इसके बाद अब नए सिरे से क्षेत्रीय अस्थिरता का खतरा जिस पैमाने पर बढ़ गया है, वह किस दिशा की ओर बढ़ेगा, यह देखने की बात होगी। इसके अलावा, इजराइली हमले में ईरान के कई इलाकों में भारी नुकसान पहुंचा और सैकड़ों नागरिक मारे गए।

जवाब के तौर पर ईरान ने भी अमेरिका और इजराइल के कई ठिकानों पर समान तीव्रता वाले हमले किए और कई जगहों पर व्यापक क्षति हुई। सवाल है कि इस युद्ध का उद्देश्य आखिर क्या है? अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि मकसद सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने से आगे ईरान की सत्ता में बैठी व्यवस्था को हटाना है। यह समझना मुश्किल है कि अमेरिका एक ओर ईरान को परमाणु कार्यक्रम पर समझौते के लिए दबाव बनाता रहा है, तो अब वह अपना उद्देश्य मौजूदा ईरानी सत्ता को खत्म करना बता रहा है।

ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने के लिए ओमान की मध्यस्थता में शांति वार्ता भी चल रही थी। हालांकि ईरान ने युद्ध से बचने की इच्छा जरूर जताई थी, लेकिन उसने यूरेनियम समृद्ध करने का अधिकार रखने की बात दोहराई। अब इजराइल और अमेरिका के साझा हमले के बाद यह वार्ता फिलहाल बेमानी हो चुकी है। जिस दौर में विकास के नारे के साथ सभी देश बेहतर भविष्य का सफर तय करना चाहते हैं, उसमें संवाद के रास्ते बंद करके युद्ध का रास्ता अख्तियार करने का नतीजा आखिर क्या निकलेगा?

रूस-यूक्रेन के बीच जारी युद्ध वैश्विक शांति के लिए पहले ही एक जटिल चुनौती है। हाल ही में पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच भड़की खुली जंग ने भी एक नया मोर्चा खोल दिया। अब इजराइल और अमेरिका के साझा हमले और खासतौर पर खामेनेई की मौत के बाद ईरान की प्रतिक्रिया क्या होगी, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कैसे समीकरण खड़े होंगे, किन देशों के बीच नई मोचेर्बंदी होगी और युद्ध कितने बड़े दायरे में फैलेगा, ये प्रश्न वैश्विक चिंता का केंद्र बनने वाले हैं।

इसके मद्देनजर भारत के लिए एक जरूरी कदम यह होना चाहिए कि युद्धग्रस्त इलाकों से अपने नागरिकों को सुरक्षित निकालने के प्रयास हों। आज दुनिया में युद्ध के कई मुहाने खुल गए हैं, अगर उसे रोका नहीं गया, तो फिर व्यापक जंग के त्रासद नतीजे सामने होंगे।

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Israel-Iran War: खाड़ी देशों के लिए ‘टर्निंग पॉइंट’ (Source: Reuters)

Israel-Iran War: ईरान पर अमेरिका-इजराइल के व्यापक हमले को दो दिन हुए हैं, यह पहले से ही साफ है कि इसका मध्य-पूर्व और खासकर खाड़ी पर गहरा असर पड़ेगा। अमेरिका-इजराइल की बमबारी में कई बड़े अधिकारियों के साथ सर्वोच्च नेता अली खामेनेई और उनके परिवार के लोग भी मारे गए हैं। ईरान में 40 दिन का शोक है। तेहरान ने न सिर्फ इजराइल बल्कि इस इलाके के कई देशों पर हमले करके जवाब दिया है। पढ़िए पूरा लेख…