इसमें कोई दोराय नहीं कि ईरान पर इजराइल और अमेरिका के साझा हमले के बाद अब स्थिति और जटिल होती देखी जा रही है तथा दोनों पक्षों के बीच बढ़ती तल्खी के समांतर शांति की उम्मीद भी धुंधला रही है। मगर इस हालत में भी दुनिया के ज्यादातर देश यही चाहते हैं कि यह युद्ध रुके और विवाद का हल संवाद के सहारे ही निकाला जाए।

विडंबना यह है कि ईरान में परमाणु हथियारों का सवाल अमेरिका के लिए बड़ा है, लेकिन वह इस मसले पर बातचीत के जरिए हल निकालने में कोई रुचि नहीं दिखा रहा। उल्टे इजराइल के साथ मिल कर उसने जिस स्तर का युद्ध छेड़ दिया है, वह परमाणु निरस्त्रीकरण में कैसे मददगार होगा, कहना कठिन है।

खासतौर पर इस संदर्भ में ईरान ने जिस तरह की प्रतिक्रिया दी और उसने भी इजराइल तथा अमेरिका के सैन्य ठिकानों पर व्यापक हमले किए हैं, उससे साफ लग रहा है कि शांति स्थापित करने को लेकर दोनों पक्षों के भीतर कोई खास रुचि नहीं है। इसी वजह से दुनिया भर में इस बात को लेकर गहरी चिंता जाहिर की जा रही है कि कहीं युद्ध का दायरा फैल न जाए!

ऐसे में भारत ने जिस तरह सभी पक्षों से संयम बरतने, तनाव को कम करने के लिए संवाद और कूटनीति का रास्ता अपनाने का आग्रह किया है, वह वक्त का तकाजा है। हालांकि भारत पारंपरिक रूप से शांति का पक्षधर रहा है और समस्या चाहे कितनी जटिल हो, उसका समाधान संवाद और कूटनीतिक पहल के जरिए ही निकालने का हामी है।

इस क्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि पश्चिम एशिया की स्थिति भारत के लिए चिंता का विषय है; सैन्य टकराव किसी विवाद का समाधान नहीं है। भारत ने इस युद्ध से प्रभावित कई देशों से संपर्क कर शांति की वकालत की और अपने नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने का आग्रह किया।

इससे पहले संयुक्त राष्ट्र महासचिव अंतोनियो गुतारेस ने भी इस युद्ध की निंदा की और दोनों पक्षों से अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करने की अपील की थी। अफसोस की बात है कि सभी तकाजों की अनदेखी कर युद्ध में शामिल देश व्यापक जनसंहार के हथियारों से हमला करते हुए इतना ध्यान रखना भी जरूरी नहीं समझते कि उन्होंने किसी स्कूल पर भी बम गिराया, जहां पढ़ने वाले कई मासूमों की जान चली गई।

सवाल है कि वह कौन-सी समस्या है, जिसका हल विनाश के हथियारों के जरिए निकलने की उम्मीद की जाती है। आखिर ऐसा क्यों है कि अक्सर युद्धों के लंबा खिंचने और भारी तबाही के बाद उसका समाधान संवाद की मेज पर ही निकलता देखा गया है? ज्यादातर युद्धों के मामले में यही सच है। फिर उनसे सबक लेकर तमाम असहमतियों या मतभेदों के बावजूद संवाद का सहारा लेकर विवाद का हल क्यों नहीं खोजा जाता?

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का आरोप रहा है कि ईरान परमाणु हथियार बना रहा है। मगर इस संबंध में जिनेवा में हुई बातचीत को आगे बढ़ाने और हल निकालने के बजाय युद्ध को ही आखिरी उपाय क्यों मान लिया गया? खासतौर पर तब, जब ईरान का रुख नरम पड़ रहा था और ऐसे संकेत भी सामने आए थे कि कोई समझौता होने की संभावना है।

जाहिर है, विवाद का हल निकालने की स्थितियां संवाद के जरिए ही बन रही थी। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि खुद में एक जटिल समस्या है। इसलिए हर हाल में विवाद का हल संवाद और कूटनीति के जरिए ही तलाशने की कोशिश की जानी चाहिए।