पश्चिम एशिया में युद्ध से उपजे संकट के बीच यह पहला मौका था, जब ईरान और इजराइल-अमेरिका के बीच चौदह दिनों के युद्धविराम पर सहमति बनी थी। मगर इजराइल ने बुधवार को ही जिस तरह लेबनान पर हमला किया, उससे साफ है कि युद्धविराम में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है। गौरतलब है कि लेबनान पर इजराइली हमले में दो सौ से ज्यादा आम लोग मारे गए।

विचित्र है कि ईरान के खिलाफ युद्ध में अमेरिका और इजराइल साझा मोर्चे के तहत हमले कर रहे थे, लेकिन जब दोनों पक्षों के बीच युद्धविराम पर सहमति बनी, तो उसे ठोस आकार देने के बजाय इजराइल ने समझौते को तोड़ने की पृष्ठभूमि बनानी शुरू कर दी। जबकि इस बीच इजराइल और अमेरिका की ओर से जिस तरह की बेलगाम बयानबाजियां जारी रहीं, उससे पहले ही हालात और बिगड़ने की आशंका बनी हुई थी। विडंबना यह भी है कि लेबनान पर इजराइल के हमले के बाद अब ईरान ने फिर से होर्मुज जलमार्ग को बंद करने की घोषणा की है।

निश्चित रूप से ईरान के इस रुख को उसकी प्रतिक्रिया कहा जा सकता है, लेकिन सवाल है कि इस समूचे परिदृश्य में किसी भी पक्ष की जिद और अकड़ का नतीजा क्या निकल रहा है! इजराइल और अमेरिका ने जिस दिन ईरान पर साझा हमला किया था, तभी से यह आशंका बनी हुई थी कि इसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा। इसके बाद ईरान ने स्वाभाविक ही रणनीति के तहत होर्मुज जलमार्ग को बाधित कर दिया और उसके बाद दुनिया के ज्यादातर देशों में प्राकृतिक तेल और गैस की आपूर्ति रुक गई। जिन देशों के पास इसके विकल्प थे, वहां के हालात अपेक्षया नियंत्रण में रहे, लेकिन भारत सहित बहुत सारे ऐसे देश हैं, जहां पेट्रोल-डीजल से लेकर रसोई गैस का संकट पैदा हो गया और आम लोगों का जीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है।

युद्धविराम से होर्मुज जलमार्ग खुलने की उम्मीद जगी

ऐसे में युद्धविराम की घोषणा के बाद यह उम्मीद जगी थी कि अब होर्मुज जलमार्ग के खुलने से जहाजों की आवाजाही का रास्ता खुलेगा और स्थिति सुधरेगी। मगर लेबनान पर इजराइल के ताजा हमले में जिस तरह बड़े पैमाने पर आम लोगों की मौत की खबर आई है और उसके बाद ईरान ने जैसी प्रतिक्रिया दी है, उससे एक बार फिर शांति की उम्मीदों पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

सवाल है कि अगर युद्धविराम की शर्तों में लेबनान पर भी इजराइली हमले रोकना शामिल था, तो इस पर अमल के बजाय इसे ताक पर रख कर नागरिक ठिकानों को निशाना बनाने के पीछे कौन-सी मंशा काम कर रही है। यही नहीं, इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने यह भी कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो इजराइल फिर से ईरान के खिलाफ लड़ाई शुरू करेगा। खुद अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जिस भड़काऊ लहजे में बात कर रहे हैं, उसे कैसे देखा जाएगा?

हैरानी की बात है कि ट्रंप युद्धविराम और उसकी शर्तों पर सहमति जताने के बाद लेबनान पर हमले के मसले को समझौते से अलग बताते हैं। क्या इसे शांति के लिए हुई पहलकदमी को कमजोर करने की तरह नहीं देखा जाएगा? दूसरी ओर, ईरान ने कहा कि युद्धविराम और इजराइल के जरिए जंग, दोनों साथ नहीं चल सकते। ऐसे में यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि युद्धविराम कितने दिनों तक बना रहेगा।

यह ध्यान रखने की जरूरत है कि पश्चिम एशिया के इस युद्ध का खमियाजा दुनिया के ज्यादातर देश उठा रहे हैं और अगर स्थायी युद्धविराम का रास्ता नहीं निकाला गया, तो इसके विपरीत असर को संभालना मुश्किल हो जाएगा।

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